संसद में राघव चड्ढा का बड़ा बयान: "मतदाता अगर मंत्री को हायर कर सकता है, तो फायर करने का भी अधिकार हो
- bySanjay
- 12 February, 2026
संसद में राघव चड्ढा का बड़ा बयान: "मतदाता अगर मंत्री को 'हायर' कर सकता है, तो 'फायर' करने का भी अधिकार हो"
नई दिल्ली, 11 फरवरी 2026: आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने बुधवार को संसद के शून्यकाल के दौरान एक अहम मुद्दा उठाते हुए 'राइट टू रिकॉल' (जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने के अधिकार) की जोरदार वकालत की। उन्होंने कहा कि अगर देश के मतदाताओं को अपने प्रतिनिधियों को चुनने (हायर) का अधिकार है, तो उन्हें खराब प्रदर्शन करने वाले जनप्रतिनिधियों को बर्खास्त (फायर) करने का भी अधिकार मिलना चाहिए ।
'पांच साल का वक्त बहुत लंबा'
राघव चड्ढा ने सदन में तर्क दिया कि मौजूदा व्यवस्था में अगर कोई सांसद या विधायक अपने क्षेत्र और जनता के प्रति लापरवाह है या अपने वादों से मुकर जाता है, तो उसे हटाने का कोई सीधा तंत्र नहीं है। उन्होंने कहा, "पांच साल का कार्यकाल प्रदर्शन मूल्यांकन के लिहाज से बहुत लंबा होता है। कोई भी पेशा ऐसा नहीं है, जहां आप पांच साल तक लगातार फेल होते रहें और आपके खिलाफ कोई कार्रवाई न हो।"
क्या है प्रस्तावित तंत्र?
अपने संबोधन में चड्ढा ने स्पष्ट किया कि इस अधिकार का दुरुपयोग रोकने के लिए उन्होंने कई सुरक्षा उपाय भी सुझाए हैं। उनके प्रस्तावित फ्रेमवर्क के मुताबिक:
याचिका: किसी नेता को हटाने के लिए कम से कम 35 से 40 प्रतिशत मतदाताओं के हस्ताक्षर वाली सत्यापित याचिका लगे ।
कूलिंग पीरियड: चुनाव जीतने के बाद कम से कम 18 महीने तक नेता को काम करने का मौका दिया जाए, इस दौरान उसे नहीं हटाया जा सके ।
आधार: हटाने का आधार सिर्फ भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी या कर्तव्य में गंभीर लापरवाही हो, न कि राजनीतिक असहमति ।
जनमत: अंतिम फैसला जनता करेगी। अगर रिकॉल वोट में 50 प्रतिशत से अधिक मतदाता हटाने के पक्ष में होते हैं, तभी नेता को पदमुक्त किया जाएगा ।
'लोकतंत्र का बीमा' बनाम 'खतरनाक विचार'
राघव चड्ढा ने इसे लोकतंत्र को मजबूत करने वाला कदम बताते हुए कहा कि यह राजनेताओं के खिलाफ हथियार नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए "बीमा" है। उन्होंने कहा कि जहां एक तरफ हम राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और न्यायाधीशों को हटाने के लिए महाभियोग का प्रावधान रखते हैं, वहीं एक गैर-निष्पादित सांसद/विधायक को जनता क्यों बर्दाश्त करे?
हालांकि, इस प्रस्ताव पर सदन में विरोध भी हुआ। कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने इसका कड़ा विरोध करते हुए इसे "लोकतंत्र के लिए खतरनाक" बताया और कहा कि इससे राजनीतिक अस्थिरता पैदा होगी ।
स्थानीय निकायों में पहले से मौजूद है व्यवस्था
गौरतलब है कि राघव चड्ढा ने यह भी बताया कि भारत में कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में ग्राम पंचायत स्तर पर यह अधिकार पहले से मौजूद है, जहां ग्राम सभा अविश्वास प्रस्ताव लाकर सरपंच को हटा सकती है। उन्होंने कनाडा और स्विट्जरलैंड सहित 24 से अधिक लोकतांत्रिक देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि यह कोई नई अवधारणा नहीं है ।
इस मांग ने संसद में जहां एक ओर जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है, वहीं इसे लागू करने की कानूनी और राजनीतिक चुनौतियों पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

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