तमिलनाडु विधानसभा के पहले दिन हंगामा: राज्यपाल ने राष्ट्रीय गान के अपमान का आरोप लगाकर सदन छोड़ा
- byAman Prajapat
- 20 January, 2026
तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर वो दृश्य देखने को मिला जो अब नया नहीं, बल्कि एक पुरानी स्क्रिप्ट जैसा लगता है—संवैधानिक पद बनाम निर्वाचित सरकार। विधानसभा सत्र के पहले ही दिन राज्यपाल द्वारा सदन से बाहर निकल जाना न सिर्फ़ राजनीतिक हलकों में हलचल मचा गया, बल्कि एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर गया: क्या संवैधानिक मर्यादा अब सिर्फ़ काग़ज़ों तक सिमट कर रह गई है?
🏛️ क्या हुआ विधानसभा में?
विधानसभा सत्र के उद्घाटन के दौरान जब कार्यवाही शुरू हुई, तभी राज्यपाल ने यह आरोप लगाया कि राष्ट्रीय गान का अपमान किया गया। इसी आरोप के साथ उन्होंने बिना भाषण दिए सदन छोड़ दिया। यह कदम अचानक था, लेकिन पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं।
राज्यपाल का कहना था कि परंपरा और संवैधानिक नियमों के अनुसार राष्ट्रीय गान का सम्मान अनिवार्य है और इसमें किसी भी प्रकार की ढिलाई देश के सम्मान के खिलाफ़ है।
⚖️ सरकार का पक्ष क्या है?
तमिलनाडु सरकार और सत्तारूढ़ दल DMK ने राज्यपाल के आरोपों को राजनीतिक स्टंट बताया। सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय गान को लेकर कोई भी नियम नहीं तोड़ा गया और राज्यपाल पहले से ही टकराव के मूड में थे।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच पिछले कई महीनों से तनातनी चल रही है—चाहे वो विधेयकों को मंज़ूरी देने का मामला हो या नीतिगत असहमति।
📜 संवैधानिक परंपरा बनाम राजनीतिक वास्तविकता
भारत का संविधान राज्यपाल को एक निष्पक्ष संवैधानिक प्रमुख मानता है। लेकिन हाल के वर्षों में कई राज्यों में यह पद राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बनता जा रहा है।
तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल—हर जगह कहानी लगभग एक जैसी है। सवाल यह नहीं कि राज्यपाल सही थे या सरकार, सवाल यह है कि संविधान की आत्मा कहाँ खो गई?
🇮🇳 राष्ट्रीय गान और भावनात्मक राजनीति
राष्ट्रीय गान भारत के लिए सिर्फ़ एक गीत नहीं, बल्कि भावनाओं की धड़कन है। लेकिन जब इसी गान को राजनीतिक हथियार बना दिया जाए, तो मामला संवेदनशील से ज़्यादा विस्फोटक हो जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर ज़रा-सी चूक भी बड़े टकराव का रूप ले लेती है, और कई बार जानबूझकर इसे उछाला भी जाता है।
🔥 विपक्ष का हमला
विपक्षी दलों ने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतंत्र के लिए शर्मनाक बताया। उनका कहना है कि
“जब विधानसभा के पहले ही दिन ऐसी नौबत आ जाए, तो पूरे सत्र का माहौल ज़हरीला हो जाता है।”
🧠 विशेषज्ञों की राय
संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यपाल को विरोध दर्ज कराने के और भी तरीके थे। सदन छोड़ना एक अत्यधिक कदम माना जा रहा है।
उनके अनुसार:
राज्यपाल का कर्तव्य है कि वे सरकार और संविधान के बीच संतुलन बनाए रखें
सार्वजनिक टकराव से संस्थानों की गरिमा कम होती है

🗳️ आगे क्या असर पड़ेगा?
इस घटना के बाद:
केंद्र और राज्य के रिश्ते और तनावपूर्ण हो सकते हैं
आने वाले विधेयकों पर राज्यपाल की भूमिका और विवादास्पद हो सकती है
राजनीतिक ध्रुवीकरण और तेज़ होगा
🕊️ निष्कर्ष
तमिलनाडु विधानसभा का पहला दिन लोकतंत्र के उत्सव की जगह संवैधानिक टकराव का मंच बन गया। राष्ट्रीय गान जैसे पवित्र प्रतीक को लेकर उठा यह विवाद बताता है कि आज की राजनीति में भावनाएं भी रणनीति बन चुकी हैं।
सच कड़वा है, लेकिन साफ़ है—
जब संस्थाएं आमने-सामने आ जाएं, तो नुकसान सिर्फ़ लोकतंत्र का होता है।
पुराने ज़माने में मतभेद बंद कमरों में सुलझाए जाते थे, आज कैमरों के सामने लड़े जाते हैं। वक्त बदला है, मगर गरिमा का मतलब नहीं बदलना चाहिए।
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