वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 LIVE: डावोस में यूरोपीय नेताओं का मंचन, ट्रंप की गूंज से हिली वैश्विक व्यवस्था
- byAman Prajapat
- 20 January, 2026
डावोस की बर्फ़ीली वादियों में एक बार फिर वही पुराना नज़ारा—दुनिया के ताक़तवर चेहरे, भारी कोट, सख़्त बयान और कैमरों की चमक। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 का मंच सजा, और जैसे ही यूरोपीय संघ के नेता मंच पर आए, हवा में गंभीरता घुल गई। यह सिर्फ़ भाषण नहीं थे; यह आने वाले दशक की पटकथा थी।
और हाँ, इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप का नाम—बिना मंच पर आए—पूरे सम्मेलन में गूंजता रहा। सच कहें तो वैश्विक व्यवस्था को हिलाने के लिए उनकी मौजूदगी ज़रूरी भी नहीं।
यूरोप की आवाज़: एकता या मजबूरी?
यूरोपीय नेताओं ने एक सुर में स्थिरता, नियम-आधारित व्यवस्था और बहुपक्षीय सहयोग की बात की। यह वही यूरोप है जिसने युद्धों की राख से उठकर संस्थानों पर भरोसा बनाया था। उनके शब्दों में इतिहास का वजन था—कि नियम टूटेंगे तो सबसे पहले कमज़ोर पिसेंगे।
लेकिन अंदरखाने की सच्चाई भी सब जानते हैं: ऊर्जा सुरक्षा, मंदी का डर, आपूर्ति शृंखलाओं की नाज़ुकता—सब कुछ दबाव में है। मंच पर एकता दिखी, पर पंक्तियों के बीच बेचैनी साफ़ झलकती रही।
ट्रंप फैक्टर: पुरानी धुन, नया शोर
डोनाल्ड ट्रंप की नीतियाँ—संरक्षणवाद, सख़्त व्यापार रुख़, “पहले अपना देश”—फिर से वैश्विक बहस का केंद्र बनीं। यूरोपीय नेताओं ने सीधे नाम लिए बिना संकेत दिए कि एकतरफ़ा फैसले दुनिया को पीछे धकेलते हैं।
यह वही बहस है जो दशकों से चलती आ रही है: खुले बाज़ार बनाम राष्ट्रीय हित। फर्क बस इतना है कि आज दांव ज़्यादा बड़ा है। वैश्वीकरण की पुरानी किताब फट चुकी है, और नई किताब अभी लिखी जा रही है।
अर्थव्यवस्था: सुस्ती, सुधार और सख़्त फैसले
डावोस में अर्थव्यवस्था की बात बिना कड़वे सच के अधूरी रहती है। यूरोप ने निवेश, नवाचार और औद्योगिक नीति पर ज़ोर दिया। हरित अर्थव्यवस्था को भविष्य बताया गया, लेकिन यह भी माना गया कि बदलाव मुफ़्त नहीं आता।
कर, सब्सिडी और नियमन—ये शब्द जितने तकनीकी हैं, उतने ही राजनीतिक। जनता का धैर्य सीमित है, और नेताओं के पास समय कम। यह संतुलन साधने की जंग है।
जलवायु और ऊर्जा: आदर्श बनाम वास्तविकता
जलवायु संकट पर यूरोप का रुख़ साफ़ रहा—कटौती, संक्रमण और जवाबदेही। पर मंच से नीचे आते ही सवाल उठते हैं: क्या उद्योग तैयार हैं? क्या आम नागरिक कीमत चुकाने को राज़ी हैं?
डावोस ने फिर याद दिलाया कि प्रकृति से समझौता महँगा पड़ता है, लेकिन नीतिगत फैसले टालना उससे भी ज़्यादा ख़तरनाक है।
सुरक्षा और भू-राजनीति: बदलती सीमाएँ, बदलते गठबंधन
वैश्विक सुरक्षा पर चर्चा में अनिश्चितता छाई रही। गठबंधन मज़बूत दिखे, पर भरोसा नाज़ुक। तकनीक, साइबर सुरक्षा और रक्षा खर्च—सब पर खुले तौर पर बात हुई।
यूरोप ने स्पष्ट किया कि वह पीछे हटने वाला नहीं, लेकिन टकराव भी नहीं चाहता। यह वही पुरानी यूरोपीय सोच है—संयम, संवाद और संस्थाएँ।

डावोस का सबक: इतिहास की गूंज
डावोस 2026 ने एक बात साफ़ कर दी—दुनिया किसी एक दिशा में नहीं चल रही। यहाँ पुरानी परंपराएँ और नए झटके आमने-सामने हैं। यूरोप अतीत से सीख लेकर भविष्य गढ़ना चाहता है, जबकि ट्रंप की राजनीति व्यवस्था को चुनौती देने का साहस दिखाती है—चाहे कीमत कुछ भी हो।
सच यह है कि वैश्विक व्यवस्था अब आराम में नहीं है। यह दौर शोर का है, टकराव का है, और सख़्त फैसलों का है।
निष्कर्ष: बिना भ्रम के आगे का रास्ता
डावोस का मंच हमेशा से सत्ता की नब्ज़ रहा है। 2026 में यह नब्ज़ तेज़ थी, कभी असहज, कभी निर्णायक। यूरोपीय नेताओं ने स्थिरता का झंडा उठाया, और ट्रंप की छाया ने याद दिलाया कि बदलाव दरवाज़ा खटखटाकर नहीं आता—वह धक्का देता है।
जो यह समझ गया, वही टिकेगा। बाकी इतिहास के फुटनोट बनेंगे।
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