IDFC बैंक 590 करोड़ फ्रॉड: कैसे बैंक मैनेजर ने रचा बड़ा घोटाला? अंदर की पूरी कहानी
- bypari rathore
- 25 February, 2026
IDFC First Bank में 590 करोड़ की धोखाधड़ी: भरोसे का सिस्टम कैसे बना सबसे बड़ी कमजोरी?
By [Your Blog Name] | ताज़ा खबर | 25 फरवरी 2026
भारत के बैंकिंग सेक्टर को हिला देने वाले 590 करोड़ रुपये के कथित फ्रॉड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारा वित्तीय सिस्टम भरोसे के सहारे ज़रूरत से ज़्यादा चल रहा है? IDFC First Bank से जुड़े इस मामले में आरोप है कि बैंक के एक मैनेजर ने सिस्टम की खामियों और सरकारी खातों की ढीली निगरानी का फायदा उठाकर लंबे समय तक गड़बड़ी को अंजाम दिया।
आइए समझते हैं इस पूरे घोटाले की अंदरूनी कहानी — आसान भाषा में।
🔎 कहां से शुरू हुई गड़बड़ी?
सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में जिस ब्रांच की भूमिका सामने आई, वहां सरकारी विभागों के खाते संचालित हो रहे थे। आमतौर पर ऐसे खातों में रोज़ाना के लेनदेन का गहन ऑडिट नहीं होता। विभाग अक्सर बैंक के स्टेटमेंट पर भरोसा करते हैं।
यहीं से खेल शुरू हुआ।
आरोप है कि बैंक मैनेजर ने:
फर्जी एंट्रीज़ के जरिए रकम को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किया
आंतरिक सिस्टम में अस्थायी समायोजन (adjustments) दिखाकर रकम को “मैनेज” किया
लंबे समय तक छोटे-छोटे अमाउंट में ट्रांजैक्शन कर शक से बचने की कोशिश की
धीरे-धीरे यह रकम बढ़ते-बढ़ते 590 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
⚙️ सिस्टम की कौन सी कमजोरी बनी वजह?
सरकारी खातों की कम निगरानी – रोज़ाना मिलान (reconciliation) नहीं होना
आंतरिक ऑडिट में देरी – ब्रांच लेवल पर डेटा की समय पर जांच नहीं
सिंगल-पॉइंट कंट्रोल – एक ही अधिकारी के पास ज्यादा अधिकार
बैंकिंग एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर रियल-टाइम अलर्ट सिस्टम और नियमित बाहरी ऑडिट होता, तो गड़बड़ी पहले पकड़ी जा सकती थी।
🕵️♂️ कैसे खुला मामला?
बताया जा रहा है कि एक रूटीन ऑडिट के दौरान खातों में असामान्य बैलेंस और एंट्रीज़ सामने आईं। इसके बाद:
आंतरिक जांच शुरू हुई
संदिग्ध ट्रांजैक्शन की सूची बनाई गई
संबंधित अधिकारियों से पूछताछ की गई
जांच के बाद मामला उच्च स्तर तक पहुंचा और कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हुई।
💬 बैंक और प्रशासन की प्रतिक्रिया
मामले के सामने आने के बाद बैंक प्रबंधन ने कहा है कि:
दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी
आंतरिक नियंत्रण प्रणाली को और मजबूत किया जाएगा
प्रभावित खातों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी
साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि ग्राहकों के पैसे पर सीधा असर नहीं पड़ेगा।
📌 बड़ा सवाल: क्या सिर्फ एक व्यक्ति जिम्मेदार?
हालांकि शुरुआती रिपोर्ट में बैंक मैनेजर को मास्टरमाइंड बताया जा रहा है, लेकिन इतने बड़े स्तर की धोखाधड़ी में:
क्या और लोग शामिल थे?
क्या ऑडिट सिस्टम पूरी तरह फेल हुआ?
क्या नियामक स्तर पर निगरानी में कमी रही?
ये सवाल अभी जांच के दायरे में हैं।
📊 क्या सीख मिलती है?
यह मामला साफ दिखाता है कि:
बैंकिंग सिस्टम सिर्फ टेक्नोलॉजी पर नहीं, बल्कि पारदर्शिता और नियमित निगरानी पर भी टिका होता है।
सरकारी विभागों और बैंकों — दोनों को:
नियमित reconciliation
डिजिटल ट्रैकिंग
ड्यूल ऑथराइजेशन सिस्टम
और थर्ड-पार्टी ऑडिट
जैसे कदम अपनाने होंगे।
📝 निष्कर्ष
590 करोड़ का यह कथित फ्रॉड सिर्फ एक बैंक या एक ब्रांच की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे वित्तीय सिस्टम के लिए चेतावनी है। भरोसे पर चलने वाले खातों में अगर निगरानी ढीली हो जाए, तो नुकसान कितना बड़ा हो सकता है — यह मामला उसी का उदाहरण है।
जांच अभी जारी है। जैसे-जैसे नए खुलासे होंगे, यह कहानी और भी परतें खोल सकती है।
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