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दशहरे पर रावण दहन के बाद शोक क्यों मनाता है जोधपुर का यह समाज? मंडोर से जुड़ी है सदियों पुरानी मान्यता

दशहरे पर रावण दहन के बाद शोक क्यों मनाता है जोधपुर का यह समाज? मंडोर से जुड़ी है सदियों पुरानी मान्यता

देशभर में दशहरे का उत्सव, लेकिन जोधपुर में रावण की मृत्यु पर शोक की परंपरा

जोधपुर। विजयादशमी का पर्व देशभर में बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन कर लोग उत्सव मनाते हैं। लेकिन राजस्थान के जोधपुर में रावण से जुड़ी एक ऐसी स्थानीय परंपरा भी है, जो दशहरे को एक अलग सांस्कृतिक पहचान देती है। यहां कुछ परिवार रावण दहन के बाद उत्सव मनाने के बजाय शोक से जुड़ी धार्मिक रस्में निभाते हैं।

इस परंपरा का संबंध जोधपुर के मंडोर क्षेत्र और रावण की पत्नी मंदोदरी से जुड़ी स्थानीय मान्यता से बताया जाता है। इसी कारण दशहरे के अवसर पर यहां निभाई जाने वाली रस्में लोगों के बीच चर्चा का विषय बनती हैं।

मंडोर को क्यों माना जाता है मंदोदरी का मायका?

स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार, मंडोर को रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका माना जाता है। प्रचलित कथा में मंदोदरी को मायासुर की पुत्री बताया गया है और रावण के विवाह का संबंध मंडोर से जोड़ा जाता है।

इसी मान्यता के आधार पर जोधपुर के दवे गोधा ब्राह्मण समाज के कुछ परिवार रावण के साथ पारिवारिक और धार्मिक जुड़ाव मानते हैं। समाज के लोग पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार रावण को अपना पूर्वज मानकर उसकी पूजा-अर्चना करते हैं।

यहां यह समझना जरूरी है कि मंदोदरी के मायके और रावण के विवाह से जुड़ी ये बातें स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और लोककथाओं का हिस्सा हैं। इन्हें प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्यों से अलग समझा जाना चाहिए।

रावण दहन के बाद क्या करते हैं परिवार?

स्थानीय परंपरा के अनुसार, दशहरे पर रावण दहन के बाद समाज के कुछ परिवार स्नान करते हैं, अपना जनेऊ बदलते हैं और रावण से जुड़े मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक रस्मों के दौरान आरती और भोग भी लगाया जाता है।

इन परिवारों के लिए यह अवसर सामान्य उत्सव से अलग महत्व रखता है। वे रावण की मृत्यु को अपने पूर्वज से जुड़ी मान्यता के अनुसार देखते हुए शोक व्यक्त करते हैं। इस परंपरा का उद्देश्य रावण के प्रति उनकी धार्मिक आस्था और पारिवारिक जुड़ाव को अभिव्यक्त करना बताया जाता है।

रावण को विद्वान के रूप में भी देखते हैं समाज के लोग

रावण का उल्लेख भारतीय धार्मिक कथाओं में लंका के राजा के रूप में मिलता है। स्थानीय परंपरा से जुड़े लोग उसके विद्वान, शिवभक्त और संगीत के जानकार होने के पहलुओं को भी महत्व देते हैं।

यही वजह है कि रावण को लेकर उनकी मान्यता सामान्य दशहरा परंपरा से अलग दिखाई देती है। जहां अधिकांश स्थानों पर रावण दहन को अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, वहीं ये परिवार अपनी मान्यता के अनुसार उसकी मृत्यु के बाद धार्मिक रस्में निभाते हैं।

इस अंतर को समझने के लिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अलग-अलग समुदाय धार्मिक कथाओं और उनसे जुड़े पात्रों को अपनी परंपराओं के अनुसार अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।

राजस्थान की सांस्कृतिक विविधता का उदाहरण

मंडोर से जुड़ी यह परंपरा बताती है कि राजस्थान की संस्कृति केवल मेलों, त्योहारों और लोकगीतों तक सीमित नहीं है। यहां धार्मिक कथाओं से जुड़ी ऐसी स्थानीय मान्यताएं भी हैं, जिनका पालन कुछ समुदाय लंबे समय से करते आ रहे हैं।

दशहरे के दिन एक ओर रावण दहन और उत्सव की परंपरा दिखाई देती है, तो दूसरी ओर जोधपुर में कुछ परिवार अपनी मान्यता के अनुसार शोक और पूजा-अर्चना करते हैं। दोनों के पीछे धार्मिक विश्वासों और परंपराओं की अलग-अलग व्याख्याएं हैं।

निष्कर्ष

जोधपुर के मंडोर और रावण से जुड़ी शोक की परंपरा राजस्थान की उन सांस्कृतिक मान्यताओं में शामिल है, जो हर साल दशहरे के आसपास लोगों का ध्यान खींचती हैं। मंदोदरी के मायके से जुड़ी लोककथा, रावण को पूर्वज मानने वाले परिवारों की आस्था और पूजा-अर्चना की रस्में इस परंपरा को विशिष्ट बनाती हैं।

यह कहानी केवल एक अलग धार्मिक रीति की चर्चा नहीं है, बल्कि यह भी दिखाती है कि भारत में एक ही पर्व को अलग-अलग समुदाय अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों और मान्यताओं के आधार पर किस तरह मनाते हैं


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