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दुनिया में बढ़ रहा है भीषण गर्मी का कहर! 5 से बढ़कर 102 सालाना हुए ‘हीट स्टॉर्म’, एक दौर 367 दिन तक चला

दुनिया में बढ़ रहा है भीषण गर्मी का कहर! 5 से बढ़कर 102 सालाना हुए ‘हीट स्टॉर्म’, एक दौर 367 दिन तक चला

दुनिया में बढ़ रहा है भीषण गर्मी का कहर! 5 से बढ़कर 102 सालाना हुए ‘हीट स्टॉर्म’, एक दौर 367 दिन तक चला

नई दिल्ली। दुनिया में जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल बढ़ते औसत तापमान तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा है। भीषण गर्मी की घटनाएं बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में फैलने और लंबे समय तक बने रहने लगी हैं। 20 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी के विस्तृत जलवायु विश्लेषण में ऐसे व्यापक और लंबे समय तक चलने वाले गर्मी के दौर को ‘हीट स्टॉर्म’ नाम दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले छह दशकों में इन घटनाओं की आवृत्ति और भौगोलिक विस्तार में बड़ा बदलाव दर्ज किया गया है।

इस विश्लेषण में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाला आंकड़ा यह है कि 1960 के दशक में ऐसी घटनाएं औसतन सालाना पांच थीं, जबकि मौजूदा दशक में इनकी औसत संख्या लगभग 102 बताई गई है। विश्लेषण के मुताबिक, कुछ घटनाएं इतनी व्यापक रही हैं कि उनका प्रभाव पृथ्वी के बड़े हिस्से तक फैला और वे कई महीनों तक बनी रहीं।

क्या है ‘हीट स्टॉर्म’ और सामान्य हीटवेव से कितना अलग?

आमतौर पर हीटवेव या लू का मतलब किसी क्षेत्र में लगातार असामान्य रूप से अधिक तापमान रहने की स्थिति से होता है। इसकी आधिकारिक परिभाषा अलग-अलग देशों और मौसम विभागों में अलग हो सकती है।

इस नई रिपोर्ट में ‘हीट स्टॉर्म’ शब्द का इस्तेमाल उन अत्यधिक व्यापक गर्मी की घटनाओं के लिए किया गया है, जो कम से कम पांच दिनों तक चलती हैं और पृथ्वी की सतह के कम से कम एक प्रतिशत हिस्से को प्रभावित करती हैं।

इस परिभाषा के कारण हर स्थानीय लू को हीट स्टॉर्म नहीं माना जाता। यहां जोर उन घटनाओं पर है, जिनमें गर्मी का असर कई बड़े क्षेत्रों में एक साथ दिखाई देता है या लंबे समय तक बना रहता है।

रिपोर्ट तैयार करने के लिए 1960 से आगे के वैश्विक तापमान आंकड़ों का विश्लेषण किया गया और दो दर्जन जलवायु शोधकर्ताओं से परामर्श लिया गया। यह एक विस्तृत डेटा-आधारित पत्रकारिक जांच है, इसलिए इसके निष्कर्षों को इसी विश्लेषण की परिभाषा और पद्धति के संदर्भ में समझना चाहिए।

1960 के दशक से अब तक कितनी बदल गई तस्वीर?

रिपोर्ट में प्रस्तुत आंकड़े वैश्विक स्तर पर व्यापक गर्मी की घटनाओं में तेज बढ़ोतरी की ओर इशारा करते हैं।

1960 का दशक: ऐसे हीट स्टॉर्म औसतन लगभग पांच प्रति वर्ष दर्ज किए गए।

मौजूदा दशक: रिपोर्ट के विश्लेषण में इनकी औसत संख्या लगभग 102 सालाना बताई गई है।

सबसे लंबी प्रमुख घटना: ‘हीट स्टॉर्म वेरा’ 367 दिनों तक चली।

भौगोलिक विस्तार: वेरा के दौरान प्रभावित क्षेत्र का विस्तार पृथ्वी के लगभग 85 प्रतिशत हिस्से तक बताया गया।

इन आंकड़ों का अर्थ यह नहीं है कि पृथ्वी के 85 प्रतिशत हिस्से में हर समय समान तापमान या एक जैसी गर्मी रही। इसका आशय रिपोर्ट की विश्लेषण पद्धति के अनुसार घटना के व्यापक भौगोलिक दायरे से है।

यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी क्षेत्र में गर्मी की तीव्रता, उसकी अवधि और प्रभावित क्षेत्र का आकार तीन अलग-अलग बातें हैं।

367 दिन तक चली ‘हीट स्टॉर्म वेरा’ क्यों चर्चा में है?

रिपोर्ट में वेरा को रिकॉर्ड पर मौजूद सबसे व्यापक और लंबे गर्मी के दौरों में से एक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह घटना 2023 से 2024 के बीच 367 दिनों तक चली और इसके प्रभाव का दायरा पृथ्वी के लगभग 85 प्रतिशत हिस्से तक पहुंचने की बात कही गई है।

इस दौरान अलग-अलग देशों और क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी से जुड़ी गंभीर परिस्थितियों का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट में यूरोप में जानलेवा गर्मी, फिलीपींस में विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर असर, आइवरी कोस्ट में फसलों को नुकसान और ब्राजील में डॉल्फिन की असामान्य मौतों जैसी घटनाओं को व्यापक गर्मी के प्रभावों के उदाहरण के तौर पर सामने रखा गया है।

हालांकि, इन सभी घटनाओं को केवल एक ही मौसम संबंधी कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा। प्रत्येक क्षेत्र में स्थानीय मौसम, जल की उपलब्धता, कृषि परिस्थितियां और अन्य पर्यावरणीय कारक भी प्रभाव डाल सकते हैं।

अब ‘रायमुंडो’ पर क्यों टिकी है नजर?

20 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित विश्लेषण में ‘हीट स्टॉर्म रायमुंडो’ का भी उल्लेख है। रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय यह गर्मी का दौर पृथ्वी के लगभग तीन-चौथाई हिस्से को प्रभावित कर रहा था और इसका भौगोलिक विस्तार वेरा के रिकॉर्ड से भी आगे बताया गया।

यह रिपोर्ट के प्रकाशन के समय की स्थिति है। इसे भविष्य की तारीखों के लिए मौसम का पूर्वानुमान या इस समय दुनिया के हर क्षेत्र में गर्मी होने का प्रमाण नहीं समझना चाहिए।

रायमुंडो का उदाहरण इस बात पर ध्यान खींचता है कि व्यापक गर्मी की घटनाओं को केवल किसी एक शहर के अधिकतम तापमान से समझना पर्याप्त नहीं है। इनके असर को जानने के लिए अवधि, क्षेत्रीय विस्तार और अलग-अलग स्थानों पर तापमान में असामान्य बढ़ोतरी को एक साथ देखना पड़ता है।

क्या जलवायु परिवर्तन है इसकी बड़ी वजह?

रिपोर्ट में ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते स्तर और वैश्विक तापमान में वृद्धि को व्यापक गर्मी की घटनाओं के महत्वपूर्ण कारणों में शामिल किया गया है। कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें पृथ्वी के वायुमंडल में गर्मी को रोकने की प्रक्रिया को मजबूत करती हैं। इसके कारण लंबे समय में वैश्विक तापमान बढ़ता है और कई क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी की संभावना बढ़ जाती है।

हालांकि, हर हीटवेव का समय, स्थान और तीव्रता एक जैसी नहीं होती। वायुमंडलीय परिसंचरण, मिट्टी में नमी, समुद्र की परिस्थितियां और एल नीनो जैसी प्राकृतिक जलवायु प्रक्रियाएं भी किसी घटना के स्वरूप को प्रभावित कर सकती हैं।

इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि से सही निष्कर्ष यह है कि जलवायु परिवर्तन अत्यधिक गर्मी के जोखिम को बढ़ा रहा है, लेकिन किसी विशिष्ट घटना के कारणों और उसमें जलवायु परिवर्तन की भूमिका का आकलन अलग से करना पड़ता है।

इंसानों की सेहत और रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या पड़ सकता है असर?

लंबे समय तक रहने वाली गर्मी का प्रभाव केवल मौसम के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता। जब दिन में तापमान अधिक रहता है और रात को भी पर्याप्त ठंडक नहीं मिलती, तब शरीर को सामान्य तापमान बनाए रखने में कठिनाई हो सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, अत्यधिक गर्मी मौसम से जुड़ी मौतों का एक प्रमुख कारण है। गर्मी से हृदय और श्वसन संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं तथा पहले से मौजूद बीमारियों की स्थिति बिगड़ सकती है।

इसका असर विशेष रूप से बाहरी वातावरण में काम करने वाले लोगों, बुजुर्गों, बच्चों और गर्मी से बचाव के सीमित साधनों वाले समुदायों पर पड़ सकता है।

लंबे गर्मी के दौर बिजली की मांग बढ़ा सकते हैं, पानी की उपलब्धता पर दबाव डाल सकते हैं और कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं। यदि गर्मी के साथ सूखे की स्थिति भी बनती है, तो किसानों और स्थानीय अर्थव्यवस्था के सामने अतिरिक्त चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।

भारत और राजस्थान के लिए क्या है इसका मतलब?

भारत जैसे देश में अत्यधिक गर्मी का मुद्दा खास महत्व रखता है, क्योंकि यहां बड़ी आबादी खुले वातावरण में काम करती है और कई क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान तापमान काफी बढ़ जाता है।

राजस्थान में भी लंबे गर्मी के दौर स्वास्थ्य, पेयजल, बिजली की मांग, खेती और पशुधन पर दबाव डाल सकते हैं। लेकिन वैश्विक हीट स्टॉर्म के आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि राजस्थान का प्रत्येक जिला उसी समय या उसी तीव्रता से प्रभावित होगा।

राजस्थान के लिए किसी विशेष चेतावनी, तापमान के रिकॉर्ड या आगामी दिनों के पूर्वानुमान की पुष्टि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के स्थानीय और क्षेत्रवार बुलेटिन से ही की जानी चाहिए।

आगे क्या करना जरूरी होगा?

विशेषज्ञों के लिए ऐसी घटनाओं की पहचान और निगरानी बेहतर बनाना महत्वपूर्ण है, ताकि प्रशासन और स्वास्थ्य सेवाएं समय रहते तैयारी कर सकें। गर्मी के जोखिम वाले क्षेत्रों में चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित पेयजल, काम के समय में उचित बदलाव और अस्पतालों की तैयारी जैसी व्यवस्थाएं नुकसान कम करने में मदद कर सकती हैं।

लंबे समय में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना और शहरों, गांवों तथा कृषि व्यवस्था को बदलती जलवायु के अनुरूप तैयार करना भी आवश्यक है।

निष्कर्ष

20 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित ‘हीट स्टॉर्म’ विश्लेषण दुनिया में व्यापक और लंबे समय तक चलने वाली गर्मी की घटनाओं के बदलते स्वरूप को सामने लाता है। रिपोर्ट में 1960 के दशक के लगभग पांच सालाना मामलों की तुलना में मौजूदा दशक में लगभग 102 घटनाओं का औसत बताया गया है। वेरा और रायमुंडो जैसे उदाहरण इस विषय को और गंभीर बनाते हैं।

हालांकि, इन आंकड़ों को रिपोर्ट की अपनी परिभाषा और विश्लेषण पद्धति के साथ पढ़ना जरूरी है। व्यापक संदेश यह है कि अत्यधिक गर्मी से निपटने के लिए केवल तापमान के रिकॉर्ड पर नजर रखना पर्याप्त नहीं होगा। गर्मी कितने दिन रहती है, कितने बड़े क्षेत्र को प्रभावित करती है और लोगों के स्वास्थ्य तथा आजीविका पर उसका क्या असर पड़ता है—इन सभी पहलुओं को समझना अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है


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