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दिल्ली-NCR पर फिर मंडराया स्मॉग का खतरा! पराली जलाने की घटनाएं बढ़ीं, प्रदूषण रोकने में तकनीक पर नजर

दिल्ली-NCR पर फिर मंडराया स्मॉग का खतरा! पराली जलाने की घटनाएं बढ़ीं, प्रदूषण रोकने में तकनीक पर नजर

दिल्ली-NCR में सर्दियों से पहले वायु प्रदूषण को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। 11 अक्टूबर को प्रकाशित NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, फसल अवशेष जलाने की घटनाएं सामने आ रही हैं और विशेषज्ञों के बीच इस समस्या को रोकने के लिए तकनीक के इस्तेमाल पर चर्चा तेज हुई है। रिपोर्ट का मुख्य सवाल है कि क्या बेहतर निगरानी और किसानों को किफायती विकल्प उपलब्ध कराकर आने वाले स्मॉग संकट को कम किया जा सकता है।

 

सितंबर से अक्टूबर तक 287 घटनाएं दर्ज

रिपोर्ट में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के CREAMS बुलेटिन के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि 15 सितंबर से 6 अक्टूबर 2026 के बीच सात राज्यों में फसल अवशेष जलाने की 287 घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें मध्य प्रदेश में 118, पंजाब में 88 और उत्तर प्रदेश में 65 घटनाएं सामने आई

ये आंकड़े बताते हैं कि पराली जलाने की समस्या केवल पंजाब और हरियाणा तक सीमित नहीं है। अलग-अलग राज्यों में फसल कटाई का समय, कृषि पद्धतियां और अवशेष प्रबंधन की उपलब्ध सुविधाएं भी इस समस्या को प्रभावित करती हैं।

सैटेलाइट से मिलेगी आग की जानकारी

प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके जरिए खेतों में लगी आग की घटनाओं का पता लगाने और उनके स्थान की पहचान करने में मदद मिलती है। CREAMS प्रणाली के बुलेटिन और डैशबोर्ड प्रशासन को फसल अवशेष जलाने की घटनाओं पर नजर रखने के लिए डेटा उपलब्ध कराते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, 6 अक्टूबर को ही सात राज्यों में पराली जलाने की 33 घटनाएं सैटेलाइट से दर्ज की गई थीं, जिनमें 24 मध्य प्रदेश में थीं। हालांकि, केवल आग का पता लगा लेना पर्याप्त नहीं है। प्रशासन को मौके पर जांच, समय पर कार्रवाई और किसानों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी।

 

पराली को कचरा नहीं, कमाई का साधन बनाने पर जोर

किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक फसल कटाई के बाद खेत को अगली बुवाई के लिए जल्दी तैयार करना है। पराली हटाने वाली मशीनों की कीमत, उनकी उपलब्धता और इस्तेमाल का खर्च भी कई किसानों के फैसले को प्रभावित कर सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस समस्या के समाधान के लिए कुछ तकनीकी विकल्पों पर काम किया जा सकता है:

फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें: खेतों में बची पराली को जलाने के बजाय उसका प्रबंधन करना।

बायोमास का उपयोग: कृषि अवशेषों को उपयुक्त परिस्थितियों में ईंधन या औद्योगिक कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करना।

डिजिटल निगरानी: सैटेलाइट और वास्तविक समय के डेटा से आग की घटनाओं का जल्द पता लगाना।

किसानों को आर्थिक विकल्प: पराली के संग्रह, परिवहन और उपयोग के लिए व्यावहारिक व्यवस्था विकसित करना।

इन विकल्पों का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि वे किसानों के लिए कितने सुलभ और आर्थिक रूप से व्यवहार्य हैं।

सरकार ने भी तेज की तैयारी

केंद्र सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के अनुसार, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने 29 सितंबर 2026 को हुई बैठक में पराली जलाने की रोकथाम, औद्योगिक उत्सर्जन, वाहनों से होने वाले प्रदूषण और निर्माण स्थलों की निगरानी की तैयारियों की समीक्षा की थी। आयोग ने संबंधित राज्यों और एजेंसियों से समन्वित तथा समयबद्ध कार्रवाई पर जोर दिया।

 

यह तैयारी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि दिल्ली-NCR का प्रदूषण केवल पराली जलाने से नहीं होता। वाहनों का धुआं, उद्योगों से निकलने वाला उत्सर्जन, निर्माण कार्यों की धूल और मौसम की परिस्थितियां भी वायु गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। सर्दियों में हवा की गति कम होने और प्रदूषकों के जमीन के करीब जमा होने से स्थिति और खराब हो सकती है।

क्या तकनीक अकेले रोक पाएगी स्मॉग?

विशेषज्ञों के सामने चुनौती केवल प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करना नहीं, बल्कि उन्हें कम करना भी है। सैटेलाइट निगरानी से घटनाओं का पता लगाया जा सकता है, लेकिन स्थायी सुधार के लिए किसानों को मशीनें और वैकल्पिक व्यवस्थाएं उपलब्ध कराना, औद्योगिक उत्सर्जन पर नियंत्रण और वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करना भी जरूरी होगा।

निष्कर्ष: दिल्ली-NCR में सर्दियों से पहले पराली जलाने की घटनाओं पर निगरानी और प्रदूषण नियंत्रण की तैयारियां अहम हो गई हैं। तकनीक समस्या को पहचानने और कार्रवाई बेहतर बनाने में मदद कर सकती है, लेकिन इसका असर तभी व्यापक होगा जब निगरानी के साथ जमीनी स्तर पर प्रभावी कदम भी उठाए जाएं।


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