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सूर्य के महाविस्फोटों का खुलेगा राज! भारत के आदित्य-L1 और यूरोप के प्रोबा-3 ने मिलकर रचा अंतरिक्ष विज्ञान में नया अध्याय

सूर्य के महाविस्फोटों का खुलेगा राज! भारत के आदित्य-L1 और यूरोप के प्रोबा-3 ने मिलकर रचा अंतरिक्ष विज्ञान में नया अध्याय

सूर्य के महाविस्फोटों का खुलेगा राज! भारत के आदित्य-L1 और यूरोप के प्रोबा-3 ने मिलकर रचा अंतरिक्ष विज्ञान में नया अध्याय

अंतरिक्ष में भारत और यूरोप की वैज्ञानिक साझेदारी से सूर्य के रहस्यमयी विस्फोटों को समझने की दिशा में बड़ी प्रगति, CME की ऊर्जा, घनत्व और गति का हुआ अध्ययन

सूर्य के भीतर और उसके आसपास होने वाली शक्तिशाली घटनाओं को समझने की दिशा में भारत और यूरोप के वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारत के आदित्य-L1 मिशन और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के प्रोबा-3 मिशन से प्राप्त आंकड़ों का पहली बार संयुक्त विश्लेषण किया गया है। इस अध्ययन से सूर्य से निकलने वाले विशाल पदार्थीय विस्फोटों यानी कोरोनल मास इजेक्शन (CME) के शुरुआती विकास, द्रव्यमान, घनत्व और ऊर्जा को समझने में नई जानकारी मिली है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के अनुसार, भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA), बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने आदित्य-L1 पर लगे VELC उपकरण और प्रोबा-3 के ASPIICS कोरोनाग्राफ से मिले अवलोकनों को मिलाकर अध्ययन किया। शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका 

आखिर क्या होते हैं सूर्य के CME?

सूर्य लगातार ऊर्जा उत्सर्जित करता है, लेकिन कभी-कभी उसके बाहरी वातावरण से बड़ी मात्रा में गर्म, आवेशित पदार्थ और चुंबकीय क्षेत्र अंतरिक्ष में बाहर निकलते हैं। इन घटनाओं को कोरोनल मास इजेक्शन कहा जाता है।

जब ऐसा विस्फोट पृथ्वी की दिशा में बढ़ता है, तो वह पृथ्वी के आसपास के अंतरिक्ष वातावरण को प्रभावित कर सकता है। इसके प्रभाव से उपग्रहों के संचालन, रेडियो संचार और बिजली व्यवस्था से जुड़ी तकनीकों के लिए चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। इसलिए वैज्ञानिकों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि CME कैसे शुरू होते हैं, कितनी तेजी से फैलते हैं और उनमें कितनी ऊर्जा मौजूद होती है।

अब तक सूर्य के बेहद नजदीक इन विस्फोटों के शुरुआती चरणों का अध्ययन करना कठिन रहा है। खासकर कमजोर और कम चमक वाले CME को शुरुआती अवस्था में पहचानना तथा उनकी ऊर्जा का सटीक आकलन करना वैज्ञानिकों के सामने बड़ी चुनौती रही है।

आदित्य-L1 और प्रोबा-3 की अलग-अलग ताकत

भारत का आदित्य-L1 मिशन सूर्य के अध्ययन के लिए बनाया गया है। इसे 2 सितंबर 2023 को लॉन्च किया गया था और 6 जनवरी 2024 को सूर्य-पृथ्वी L1 बिंदु के आसपास हेलो कक्षा में स्थापित किया गया। यहां से यह सूर्य की विभिन्न गतिविधियों का लगातार अवलोकन कर सकता है।

इसके VELC उपकरण के जरिए वैज्ञानिक सूर्य के बाहरी वातावरण से आने वाले प्रकाश का स्पेक्ट्रम जांचते हैं। इससे कोरोना में मौजूद गर्म गैस की प्रकृति, घनत्व और तापीय ऊर्जा के बारे में जानकारी मिलती है।

दूसरी ओर, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का प्रोबा-3 मिशन दो अंतरिक्ष यानों की मदद से कृत्रिम सूर्यग्रहण जैसी स्थिति बनाता है। दोनों यान लगभग 150 मीटर की दूरी पर सटीक तालमेल के साथ उड़ते हैं। एक यान सूर्य की सीधी रोशनी को रोकता है, जिससे दूसरे यान का ASPIICS उपकरण सूर्य के बाहरी वातावरण की स्पष्ट तस्वीरें ले सकता है।

इस तरह एक मिशन गैस के भौतिक गुणों को समझने में मदद करता है, जबकि दूसरा विस्फोट की आकृति, गति और द्रव्यमान का आकलन करने में सहायता देता है। दोनों से मिले आंकड़े मिलाकर वैज्ञानिकों को CME की ज्यादा व्यापक तस्वीर मिलती है। <

दो सौर विस्फोटों ने दी अहम जानकारी

संयुक्त अध्ययन में 14 सितंबर 2025 और 16 सितंबर 2025 को दर्ज किए गए दो CME का विश्लेषण किया गया। दोनों घटनाओं में सूर्य से निकले पदार्थ की गति और ऊर्जा के व्यवहार में अंतर पाया गया।

पहले विस्फोट की अनुमानित गति लगभग 645 किलोमीटर प्रति सेकंड थी, जबकि दूसरे की गति लगभग 145 किलोमीटर प्रति सेकंड दर्ज की गई। दूसरे विस्फोट में ऊंचाई बढ़ने के साथ घनत्व तेजी से कम हुआ, जो उसके शुरुआती विस्तार के व्यवहार के बारे में महत्वपूर्ण संकेत देता है।

वैज्ञानिकों ने दोनों उपकरणों से प्राप्त आंकड़ों की तुलना करके द्रव्यमान और तापीय ऊर्जा का आकलन किया। अलग-अलग तकनीकों से निकले अनुमान में अच्छा सामंजस्य मिला। इससे संयुक्त अवलोकन पद्धति की उपयोगिता को समर्थन मिला है। 

पृथ्वी की सुरक्षा और अंतरिक्ष मौसम के लिए क्यों अहम है यह शोध?

सूर्य की गतिविधियां केवल अंतरिक्ष वैज्ञानिकों तक सीमित विषय नहीं हैं। पृथ्वी के आसपास अंतरिक्ष का वातावरण उपग्रहों, संचार प्रणालियों और कुछ विद्युत प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए CME के शुरुआती चरणों को बेहतर तरीके से समझना भविष्य में अंतरिक्ष मौसम के पूर्वानुमान को मजबूत करने में मददगार हो सकता है।

यदि वैज्ञानिक यह अधिक सटीकता से समझ पाते हैं कि कोई CME कितनी तेजी से बढ़ रहा है, उसका द्रव्यमान कितना है और उसकी ऊर्जा किस रूप में मौजूद है, तो उसके आगे के विकास का मॉडल तैयार करना आसान हो सकता है। हालांकि, यह अध्ययन अपने आप में हर सौर विस्फोट का सटीक पूर्वानुमान या पृथ्वी पर उसके प्रभाव की निश्चित भविष्यवाणी नहीं करता।

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए भी महत्वपूर्ण उपलब्धि

आदित्य-L1 और प्रोबा-3 के आंकड़ों का संयुक्त इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग का उदाहरण है। दोनों मिशनों की क्षमताएं एक-दूसरे की पूरक हैं और इनकी मदद से सूर्य के उस क्षेत्र का अध्ययन संभव हो रहा है, जहां से कई महत्वपूर्ण सौर घटनाएं विकसित होती हैं।

यह शोध सूर्य के रहस्यों को पूरी तरह सुलझा देने का दावा नहीं करता, लेकिन CME की शुरुआती अवस्था, ऊर्जा और घनत्व को समझने के लिए वैज्ञानिकों को अधिक ठोस अवलोकन उपलब्ध कराता है। आगे के अध्ययन से यह जानने में मदद मिल सकती है कि सूर्य के विस्फोट किस तरह विकसित होते हैं और अंतरिक्ष मौसम पर उनका क्या असर पड़ सकता है।


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