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भारत के ‘सबसे स्वच्छ शहर’ में ज़हरीले नल: जल सुरक्षा को नज़रअंदाज़ करने की भारी कीमत

भारत के ‘सबसे स्वच्छ शहर’ में ज़हरीले नल: जल सुरक्षा को नज़रअंदाज़ करने की भारी कीमत

काग़ज़ पर सब चमकता है। सड़कें साफ़, कूड़े के ढेर ग़ायब, दीवारों पर स्वच्छता के पोस्टर—और ट्रॉफियों से भरे सरकारी दफ़्तर। पर ज़रा नल खोलिए। वही नल, जिससे भरोसे का पानी आना चाहिए था, वहाँ से डर टपकता है। यह कहानी भारत के उस शहर की है जिसे “सबसे स्वच्छ” कहा गया—पर जिसकी नल-धार में ज़हर घुला हुआ है।

स्वच्छता बनाम सुरक्षा: दो अलग सच

हमने स्वच्छता को झाड़ू और रैंकिंग तक सीमित कर दिया। कूड़ा उठे, फोटो खिंचे, अंक मिलें—बस। मगर जल सुरक्षा? वह चुपचाप कोने में पड़ी रही। पानी दिखने में साफ़ हो सकता है, स्वाद में ठीक लग सकता है, पर भीतर भारी धातुएँ, बैक्टीरिया और रसायन छिपे हों—तो वह साफ़ नहीं, खतरनाक है।

नल से बीमारी तक का सफ़र

जब पाइपलाइन पुरानी हो, जोड़ रिसते हों, सीवर और पानी की लाइनें गले मिलती हों—तो बीमारी का टिकट कट जाता है। डायरिया, टाइफाइड, हेपेटाइटिस, त्वचा रोग—ये सब आंकड़ों की भाषा नहीं, रोज़मर्रा की सच्चाई हैं। बच्चे स्कूल छोड़ते हैं, बुज़ुर्ग अस्पतालों की कतार में खड़े होते हैं, और घर का बजट दवाइयों में बह जाता है।

जांच कहाँ है, जवाबदेही किसकी?

जल परीक्षण की रिपोर्टें अक्सर फाइलों में सोती हैं। कहीं जांच होती भी है, तो साल में एक-दो बार—वह भी औपचारिक। जबकि पानी रोज़ पिया जाता है। जवाबदेही की गेंद नगर निगम, जल बोर्ड और ठेकेदारों के बीच उछलती रहती है। अंत में गिरती है—नागरिक के सिर पर।

‘क्लीन सिटी’ का भ्रम

रैंकिंग्स ने शहरों को सजाया-संवारा, पर सिस्टम को नहीं सुधारा। स्वच्छता का मतलब सिर्फ़ दिखावा नहीं—सुरक्षित पानी, हवा और भोजन भी है। अगर नल का पानी भरोसे लायक नहीं, तो स्वच्छता की ट्रॉफी खोखली है। सच कड़वा है, पर सच है।

भूजल का ज़हर, सतही समाधान

कई जगह भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइट्रेट जैसे तत्व सीमा से ऊपर हैं। ऊपर से समाधान? RO लगाओ, बोतलबंद पानी खरीदो। यानी अमीर सुरक्षित, गरीब असुरक्षित। यह कोई समाधान नहीं—यह असमानता है।

पाइपलाइन: शहर की नसें, जिनमें जंग

शहर की नसें—पाइपलाइन—दशकों पुरानी हैं। कहीं जंग, कहीं लीकेज। दबाव कम हुआ तो बाहर का गंदा पानी अंदर। मानसून में हालात और बिगड़ते हैं। मरम्मत होती है, पर पैबंद की तरह—स्थायी इलाज नहीं।

पारदर्शिता की प्यास

अगर जल गुणवत्ता की रिपोर्टें सार्वजनिक हों—वार्ड-वार्ड, मोहल्ला-मोहल्ला—तो दबाव बने। लोग सवाल पूछें, अधिकारी जवाब दें। अभी यह डेटा आम नागरिक से दूर है। अंधेरे में गलती बढ़ती है, रोशनी में सुधरती है।

टेक्नोलॉजी है, इच्छाशक्ति चाहिए

रियल-टाइम सेंसर, क्लोरीनेशन मॉनिटरिंग, GIS मैपिंग—सब मुमकिन है। पर टेक्नोलॉजी तब काम करती है जब नीयत साथ हो। वरना मशीनें भी शोपीस बन जाती हैं।

Toxic taps in India's 'cleanest city': the cost of ignoring water safety -  The Hindu
भारत के ‘सबसे स्वच्छ शहर’ में ज़हरीले नल: जल सुरक्षा को नज़रअंदाज़ करने की भारी कीमत

नागरिक क्या करें?

उबालें, फिल्टर करें—हाँ, पर सवाल भी करें। RTI डालें, स्थानीय प्रतिनिधि से मिलें, सामूहिक जांच की मांग करें। पानी निजी समस्या नहीं—सार्वजनिक अधिकार है।

नीति की दरकार

जल सुरक्षा को स्वच्छता रैंकिंग का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा। बिना सुरक्षित पानी—कोई रैंक नहीं। नियमित स्वतंत्र ऑडिट, कड़ी सज़ा, और समयबद्ध सुधार—यही रास्ता है।

अंत में—नल खोलिए, सच देखिए

परंपराएँ हमें सिखाती हैं—पानी जीवन है। इसे हल्के में मत लो। चमकदार शहरों की तस्वीरों से बाहर निकलकर नल खोलिए, और पूछिए—क्या यह पानी सच में सुरक्षित है? अगर नहीं, तो स्वच्छता की कहानी अधूरी है।

यह लेख सिर्फ़ चेतावनी नहीं—आह्वान है। क्योंकि जब तक जल सुरक्षित नहीं, तब तक कोई शहर सच में स्वच्छ नहीं।


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