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केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने को मंजूरी, बंगाल में भी नाम परिवर्तन की मांग तेज

केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने को मंजूरी, बंगाल में भी नाम परिवर्तन की मांग तेज

केंद्र सरकार की Union Cabinet ने केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह कदम राज्य की भाषाई और ऐतिहासिक पहचान को अधिक सटीक रूप से दर्शाने के उद्देश्य से उठाया गया है। आधिकारिक दस्तावेजों और संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत आगे की कार्रवाई के बाद यह परिवर्तन लागू किया जाएगा।

Kerala का नाम ‘केरलम’ मलयालम भाषा में राज्य के पारंपरिक उच्चारण और ऐतिहासिक संदर्भ को प्रतिबिंबित करता है। राज्य सरकार का मानना है कि ‘केरलम’ नाम स्थानीय संस्कृति, परंपरा और भाषाई विरासत के अधिक करीब है। इससे राज्य की पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एक विशिष्ट रूप मिलेगा।

नाम परिवर्तन का यह निर्णय राजनीतिक और सांस्कृतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। समर्थकों का कहना है कि यह कदम क्षेत्रीय अस्मिता को सशक्त करेगा और भारतीय संघीय ढांचे में विविधता का सम्मान करने का उदाहरण पेश करेगा। वहीं कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि नाम परिवर्तन से प्रशासनिक और आधिकारिक प्रक्रियाओं में बदलाव की आवश्यकता होगी, जिसके लिए समय और संसाधनों की जरूरत पड़ेगी।

इस फैसले के बाद Mamata Banerjee ने भी अपने राज्य का नाम बदलकर ‘बांग्ला’ करने की मांग एक बार फिर उठाई है। उनका कहना है कि West Bengal का नाम औपनिवेशिक काल की विरासत को दर्शाता है, जबकि ‘बांग्ला’ नाम स्थानीय भाषा और संस्कृति के अनुरूप है। इससे पहले भी पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य का नाम बदलने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा था, लेकिन वह विभिन्न कारणों से लंबित रहा।

भारत में राज्यों के नाम बदलने की प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों के तहत होती है, जिसमें संसद की मंजूरी आवश्यक होती है। अतीत में कई राज्यों और शहरों के नाम बदले जा चुके हैं, जैसे कि उड़ीसा का नाम ओडिशा और मद्रास का नाम तमिलनाडु किया गया था। ऐसे बदलाव आमतौर पर ऐतिहासिक, सांस्कृतिक या भाषाई आधार पर किए जाते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केरल को ‘केरलम’ करने की मंजूरी से अन्य राज्यों में भी इसी तरह की मांगों को बल मिल सकता है। यह कदम क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक गौरव की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।

कुल मिलाकर, केरल का नाम ‘केरलम’ करने का प्रस्ताव भारत के संघीय ढांचे में भाषाई विविधता और सांस्कृतिक सम्मान को दर्शाता है। साथ ही, पश्चिम बंगाल में ‘बांग्ला’ नाम की मांग फिर से तेज होने से यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। आने वाले समय में संसद में इस पर होने वाली बहस और अंतिम निर्णय पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।


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