डायबिटीज और हृदय रोग का आनुवंशिक खतरा कितना सच? करीब 10 लाख लोगों के डेटा से सामने आई अहम बात, DNA जोखिम बीमारी की गारंटी नहीं
- bySanjay
- 25 October, 2026
डायबिटीज और हृदय रोग का खतरा समझने में जेनेटिक्स की भूमिका, लेकिन जीवनशैली भी अहम

डायबिटीज और हृदय रोग जैसी बीमारियों के जोखिम को समझने में अब आनुवंशिक जानकारी यानी जेनेटिक्स पर भी ध्यान दिया जा रहा है। किसी व्यक्ति के DNA में मौजूद कुछ बदलाव भविष्य में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की आशंका से जुड़े हो सकते हैं। हालांकि, किसी बीमारी से संबंधित आनुवंशिक बदलाव मिलना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उस व्यक्ति को बीमारी जरूर होगी।
22 अक्टूबर 2026 को Genome Medicine जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन ने इसी अंतर को रेखांकित किया है। यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने ब्रिटेन के UK Biobank और अमेरिका के All of Us शोध कार्यक्रमों से जुड़े करीब 10 लाख लोगों के आनुवंशिक डेटा का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि अनेक लोगों के आनुवंशिक जोखिम स्कोर कुछ सामान्य बीमारियों के लिए अपेक्षाकृत ऊंचे हो सकते हैं, लेकिन आनुवंशिक जोखिम और वास्तव में बीमारी विकसित होने के बीच सीधा संबंध मान लेना सही नहीं है।
यह शोध ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब स्वास्थ्य से जुड़े DNA टेस्ट और ऑनलाइन जेनेटिक रिपोर्ट लोगों की रुचि का विषय बन रहे हैं। किसी रिपोर्ट में जोखिम अधिक दिखाई देने पर चिंता होना स्वाभाविक है, लेकिन ऐसे नतीजों को बीमारी की पक्की भविष्यवाणी नहीं समझना चाहिए। उनका अर्थ व्यक्ति की उम्र, पारिवारिक इतिहास, स्वास्थ्य की स्थिति और अन्य कारकों के साथ समझना जरूरी है।
अध्ययन में क्या सामने आया?
शोधकर्ताओं ने ब्रिटेन के अध्ययन समूह में 28 बीमारियों से जुड़े आनुवंशिक जोखिम स्कोर का विश्लेषण किया। अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार, औसतन प्रतिभागियों का आनुवंशिक जोखिम स्कोर लगभग तीन बीमारियों के लिए संबंधित तुलना समूह के शीर्ष 10 प्रतिशत में आता था। इनमें टाइप-2 डायबिटीज और हृदय संबंधी बीमारियां भी शामिल थीं। <Cite refs={["turn129476view0"]}/>
इस आंकड़े को समझना जरूरी है। किसी व्यक्ति का स्कोर शीर्ष 10 प्रतिशत में होने का अर्थ यह है कि संबंधित तुलना समूह के मुकाबले उसका आनुवंशिक स्कोर ऊंचा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उस व्यक्ति को बीमारी होने की 10 प्रतिशत संभावना है या उसे भविष्य में बीमारी होना तय है।
आनुवंशिक जोखिम स्कोर आमतौर पर DNA में मौजूद अनेक आनुवंशिक बदलावों की जानकारी को जोड़कर तैयार किए जाते हैं। इनमें से प्रत्येक बदलाव का संभावित योगदान छोटा हो सकता है, लेकिन सभी को साथ देखकर किसी खास बीमारी के प्रति आनुवंशिक प्रवृत्ति का अनुमान लगाया जाता है।
यह अनुमान बीमारी की पुष्टि करने वाले मेडिकल टेस्ट से अलग होता है। जोखिम स्कोर किसी व्यक्ति की संभावित संवेदनशीलता का संकेत दे सकता है, लेकिन अकेले इसके आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि बीमारी कब होगी या होगी भी या नहीं।
जीन बीमारी का जोखिम कैसे प्रभावित करते हैं?
जीन शरीर की संरचना और कई जैविक प्रक्रियाओं से संबंधित जानकारी रखते हैं। DNA में मौजूद कुछ बदलाव शरीर के काम करने के तरीके को प्रभावित कर सकते हैं और कुछ बीमारियों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ा सकते हैं।
उदाहरण के लिए, टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम में आनुवंशिक कारकों की भूमिका हो सकती है। लेकिन इसके साथ उम्र, शारीरिक गतिविधि, खानपान, शरीर की चयापचय संबंधी स्थिति और अन्य स्वास्थ्य कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं।
इसी तरह, हृदय रोग का जोखिम समझते समय केवल जीन पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल, रक्त शर्करा, तंबाकू के संपर्क, शारीरिक गतिविधि और परिवार में बीमारी का इतिहास जैसी जानकारियां भी चिकित्सकीय आकलन में मदद कर सकती हैं।
इसका मतलब है कि आनुवंशिक जानकारी स्वास्थ्य जोखिम की तस्वीर का एक हिस्सा है, पूरी तस्वीर नहीं।
परिवार में डायबिटीज या हृदय रोग हो तो क्या जोखिम बढ़ता है?
परिवार में किसी बीमारी का इतिहास डॉक्टर के लिए उपयोगी जानकारी हो सकता है। यदि माता-पिता, भाई-बहन या परिवार के अन्य करीबी सदस्यों में कम उम्र में डायबिटीज या हृदय रोग का पता चला हो, तो डॉक्टर व्यक्ति की परिस्थितियों के अनुसार जांच या निगरानी की सलाह दे सकते हैं।
हालांकि, परिवार के किसी सदस्य को बीमारी होने का मतलब यह नहीं है कि परिवार के दूसरे सदस्य को भी वही बीमारी होगी। परिवारों में आनुवंशिक विशेषताएं साझा हो सकती हैं, लेकिन खानपान, दैनिक गतिविधियां और आसपास का वातावरण भी समान हो सकते हैं। इसलिए परिवार में किसी बीमारी के कई मामले होने के पीछे एक से अधिक कारण हो सकते हैं।
परिवार के इतिहास को समझना उपयोगी है, लेकिन उससे अकेले व्यक्तिगत जोखिम का सटीक प्रतिशत निकालना संभव नहीं होता। इसके लिए जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय मूल्यांकन और उपयुक्त स्वास्थ्य जांच की जाती है।
जीवनशैली की भूमिका क्यों बनी रहती है अहम?
आनुवंशिक जोखिम अधिक होने पर भी स्वास्थ्य से जुड़े दूसरे कारकों की भूमिका खत्म नहीं हो जाती। संतुलित खानपान, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और तंबाकू से दूरी जैसे व्यवहार सामान्य स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।
टाइप-2 डायबिटीज के संदर्भ में भोजन की गुणवत्ता, शारीरिक गतिविधि और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों पर ध्यान देना उपयोगी हो सकता है। हृदय स्वास्थ्य के लिए रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल की निगरानी तथा चिकित्सक द्वारा बताई गई सलाह का पालन भी महत्वपूर्ण है।
यह कहना भी सही नहीं होगा कि स्वस्थ जीवनशैली हर बीमारी को पूरी तरह रोक सकती है। आनुवंशिक, जैविक और पर्यावरणीय कारक अलग-अलग लोगों में अलग तरह से काम कर सकते हैं। इसलिए बेहतर तरीका यह है कि व्यक्ति अपने नियंत्रण में आने वाले स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं पर ध्यान दे और जरूरत के अनुसार चिकित्सकीय सलाह ले।
भारतीय लोगों के लिए क्या है इसका महत्व?
अध्ययन में इस्तेमाल किया गया बड़ा आनुवंशिक डेटा मुख्य रूप से ब्रिटेन और अमेरिका के शोध कार्यक्रमों से आया था। शोध में पश्चिमी यूरोपीय वंश के लोगों का प्रतिनिधित्व अधिक था। इसलिए इसके परिणामों को भारत की पूरी आबादी पर सीधे लागू करने में सावधानी जरूरी है।
भारत में आनुवंशिक विविधता काफी व्यापक है। अलग-अलग आबादी में आनुवंशिक बदलावों की आवृत्ति और उनका बीमारियों के जोखिम से संबंध अलग हो सकता है। किसी एक आबादी में तैयार किए गए जोखिम स्कोर दूसरी आबादी में उतने ही सटीक हों, यह जरूरी नहीं है।
भारतीय आबादी पर किए गए अलग-अलग शोध भी यह दिखाते हैं कि जीन और खानपान के बीच संबंध को समझना महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, अक्टूबर 2026 में प्रकाशित चेन्नई के 1,020 वयस्कों पर आधारित एक अध्ययन में कुछ आनुवंशिक बदलावों और खानपान की गुणवत्ता के बीच रक्त में कोलेस्ट्रॉल के स्तर से संबंधित संबंध देखा गया। हालांकि, यह अध्ययन संबंध दर्शाता है, कारण और परिणाम को निश्चित रूप से साबित नहीं करता। <Cite refs={["turn129476view1","turn850074search1"]}/>
इस तरह के शोध से भविष्य में स्वास्थ्य संबंधी सलाह को अधिक व्यक्तिगत बनाने में मदद मिल सकती है, लेकिन इसके लिए अधिक विविध आबादी पर शोध और आगे की पुष्टि आवश्यक है।
क्या हर व्यक्ति को जेनेटिक टेस्ट कराना चाहिए?
नहीं। केवल किसी खबर में आनुवंशिक जोखिम का उल्लेख होने के कारण हर व्यक्ति को DNA टेस्ट कराने की जरूरत नहीं होती। आनुवंशिक जांच की उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि जांच किस उद्देश्य से की जा रही है, कौन-सी बीमारी का आकलन करना है और परिणाम से इलाज या निगरानी के फैसले में क्या मदद मिलेगी।
कुछ आनुवंशिक जांचें विशेष विरासत में मिलने वाली बीमारियों के निदान या परिवार में मौजूद किसी ज्ञात आनुवंशिक स्थिति के आकलन में उपयोगी हो सकती हैं। वहीं, कई सामान्य बीमारियों के लिए व्यापक आनुवंशिक जोखिम स्कोर वास्तविक भविष्यवाणी की सीमित क्षमता रख सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने यह भी चेताया कि अनेक बीमारियों के जोखिम स्कोर एक साथ देखने से अनावश्यक चिंता, अतिरिक्त जांच और जरूरत से ज्यादा निदान का खतरा हो सकता है। DNA रिपोर्ट में किसी बदलाव का महत्व स्पष्ट न हो, तो उसका अर्थ बीमारी की पुष्टि मानना गलत होगा।
व्यक्तिगत जोखिम जानने के लिए डॉक्टर से चर्चा करना अधिक उपयोगी है। डॉक्टर उम्र, परिवार में बीमारी का इतिहास, लक्षण, पहले से उपलब्ध जांच और अन्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों के आधार पर तय कर सकते हैं कि किस जांच की जरूरत है।
आनुवंशिक जोखिम और बीमारी में क्या अंतर है?
इन दोनों के बीच का अंतर समझना इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।
आनुवंशिक जोखिम: DNA में मौजूद कुछ विशेषताओं के आधार पर किसी बीमारी के प्रति अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशीलता का संकेत।
बीमारी का निदान: उपयुक्त चिकित्सकीय मूल्यांकन और जरूरी जांच के आधार पर यह तय करना कि व्यक्ति को संबंधित बीमारी है या नहीं।
भविष्य का अनुमान: जोखिम के कई कारकों को ध्यान में रखकर संभावित आशंका का आकलन; यह हमेशा निश्चित भविष्यवाणी नहीं होता।
इसलिए किसी व्यक्ति की आनुवंशिक रिपोर्ट में जोखिम अधिक आने पर घबराने या अपने स्वास्थ्य के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय उसके अर्थ को सही संदर्भ में समझना चाहिए।
निष्कर्ष: DNA महत्वपूर्ण है, लेकिन वही पूरी कहानी नहीं
करीब 10 लाख लोगों के आनुवंशिक डेटा पर आधारित अध्ययन ने इस बात पर ध्यान दिलाया है कि अनेक लोगों में कुछ बीमारियों के लिए आनुवंशिक जोखिम स्कोर ऊंचे हो सकते हैं। लेकिन जोखिम से जुड़ा आनुवंशिक संकेत अपने आप बीमारी की पुष्टि नहीं करता।
डायबिटीज और हृदय रोग जैसी स्थितियों को समझने के लिए आनुवंशिक जानकारी के साथ उम्र, परिवार का इतिहास, जीवनशैली और अन्य स्वास्थ्य संकेतकों को भी देखना जरूरी है। भारत जैसे विविध आबादी वाले देश में ऐसे जोखिम स्कोर कितने सटीक हैं, यह समझने के लिए स्थानीय आबादी पर और शोध की आवश्यकता है।
सबसे अहम बात: आनुवंशिक जोखिम की जानकारी को डर का कारण नहीं, बल्कि स्वास्थ्य को बेहतर समझने का एक संभावित साधन मानना चाहिए। किसी व्यक्ति के वास्तविक जोखिम और जरूरी जांच के बारे में फैसला सामान्य ऑनलाइन टेस्ट या समाचार के आधार पर नहीं, बल्कि योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह से करना अधिक उचित है।
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