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कांग्रेस और धीरेंद्र शास्त्री ने शाह रुख़ ख़ान का साथ दिया, बीजेपी ने KKR में बांग्लादेशी क्रिकेटर चुनने पर ‘गद्दार’ कहा!

कांग्रेस और धीरेंद्र शास्त्री ने शाह रुख़ ख़ान का साथ दिया, बीजेपी ने KKR में बांग्लादेशी क्रिकेटर चुनने पर ‘गद्दार’ कहा!

🏏 1. विवाद की शुरुआत – क्या हुआ असल में?

जनवरी 2026 की शुरुआत में IPL 2026 की नीलामी हुई, और कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR), जिसे बॉलीवुड सुपरस्टार शाह रुख़ ख़ान और उनकी टीम को-ओनर्स चलाते हैं, ने बांग्लादेशी तेज़ गेंदबाज़ मुस्ताफ़िज़ुर रहमान को ₹9.20 करोड़ में खरीदा।

अब ये क्रिकेट की दुनिया का बड़ा निर्णय है, लेकिन जैसे ही खबर फैली, राजनीति का तूफ़ान उठ गया। क्योंकि भारत-बांग्लादेश के रिश्तों के बीच कुछ महीनों से तनाव और विवाद चल रहे हैं — खासकर हिंदू अल्पसंख्यकों पर कथित अत्याचारों को लेकर — और इसका असर जैसे खेल तक पहुंच गया।

🗣️ 2. बीजेपी का हमला: “शाह रुख़ ख़ान गद्दार हैं!”

बीजेपी के नेता संगीत सोम ने सार्वजनिक रूप से शाह रुख़ ख़ान पर बहुत तेज़ और ज़ोरदार आरोप लगाए। और भाई, वो ज़ोरदार भी ऐसे कि सीधे “गद्दार” तक कह डाला। 

उनका कहना था कि:

👉 “जब हिंदुओं पर बांग्लादेश में अत्याचार हो रहे हैं, तब एक भारतीय सुपरस्टार बांग्लादेशी खिलाड़ी को अपनी टीम में लाकर पैसा ख़र्च कर रहा है।”
👉 “ऐसे लोग जिन्होंने इस देश में सब कुछ पाया है, उन्होंने इसे धोखा दिया।”
👉 “ये लोग इस देश में रहने का हक़ नहीं रखते।”
👉 और अगर रहमान भारत आए, तो “उसे हवाई अड्डे से बाहर निकलने भी नहीं दिया जाएगा।”

देखो, भावनाएँ इतनी तेज़ हैं कि बयान राजनीति और राष्ट्रीय भावना के बीच घूम रहा है — जो साफ़ तौर पर खेल के निर्णय से कहीं ज़्यादा बड़ा मुद्दा बन गया।

3. कांग्रेस और अन्य का रुख़ – समर्थन और जवाब

अब इस मसले पर सिर्फ़ बीजेपी ही नहीं बोल रही थी — कांग्रेस पार्टी ने भी मोर्चा संभाला। और उनका जवाब थोड़ा अलग था — वो इस आरोप को आतंकवाद या नफ़रत कहकर उठा रहे थे। 

कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने कहा:
👉 “किसी सुपरस्टार पर ‘गद्दार’ कह देना भारत की बहुलता (pluralism) पर हमला है।”
👉 “राष्ट्रीयता नफ़रत से तय नहीं होती।” 

और इस स्तर पर बहस सिर्फ़ खेल की नहीं रही — यह पूर्वाग्रह, राष्ट्रीयता, खेल और धर्म जैसे गहरे और संवेदनशील मुद्दों से जुड़े विवादों में बदल गयी।

🧘‍♂️ 4. धार्मिक नेताओं के भाषण

इस बात ने तो 火 🔥 में घी डाल दिया, जब कुछ धार्मिक नेताओं ने भी बयान दिया:

🌟 धीरेंद्र शास्त्री (Bageshwar Dham) ने ज़ोर देकर कहा कि क्रिकेट बोर्ड (BCCI) फैसला करेगा कि क्या खिलाड़ी को खेलने देना चाहिए या नहीं — लेकिन साथ ही कहा कि बांग्लादेशी खिलाड़ियों को हिंदुओं के लिए आवाज़ उठानी चाहिए। 

🌟 जगदगुरु रामभद्राचार्य और देवकीनंदन ठाकूर जैसे नेता इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि अगर किसी देश में हिंदुओं को सुरक्षा नहीं मिल रही, तो उससे खिलाड़ी लेना “अत्यंत दुखद” है। 

🌍 5. राजनीतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य

अब बात यहीं खतम नहीं हुई।
यह मुद्दा खेल रहा, तब राजनीति बन गया।
राजनीति रहा, तब देशभक्ति बन गयी।
और फिर सब मिलकर संवेदनशील सामाजिक मुद्दा बन गये।

लोग सोशल मीडिया पर दो फ़ाड़ हो गये — एक तरफ़ वो लोग जो अनुभवी खिलाड़ी के कौशल को देखते हैं, और दूसरी तरफ़ वो लोग जो राष्ट्रीय भावना और विदेश नीति के नजरिए से इस कदम को अपमानजनक मानते हैं।

📊 6. खेल के कानूनी और क्रिकेट बोर्ड का पक्ष

अब ध्यान से सुनो — IPL एक अंतरराष्ट्रीय लीग है और BCCI का नियम है कि अगर किसी विदेशी खिलाड़ी को खेलने की अनुमति है, तो उसे लीग में शामिल होना चाहिए। यहाँ तक कि BCCI ने कभी पाकिस्तानी खिलाड़ियों को बैन कर दिया था — लेकिन बांग्लादेश के लिए ऐसा कोई पॉलिसी परिवर्तन अभी तक नहीं हुआ था।

इसलिए, अगर बॉर्डर पर तनाव चल रहा है, तो खेल के नियम के हिसाब से उस खिलाड़ी के खेलने पर कोई रोक नहीं है — जब तक BCCI अनुमति देता है।

No place for traitors': BJP MLA Sangeet Som targets Shah Rukh Khan over  KKR's inclusion of Bangladeshi player | Hindustan Times
कांग्रेस और धीरेंद्र शास्त्री ने शाह रुख़ ख़ान का साथ दिया, बीजेपी ने KKR में बांग्लादेशी क्रिकेटर चुनने पर ‘गद्दार’ कहा!

🏁 7. इसका बड़ा मतलब क्या है?

अब ये सिर्फ़ खिलाड़ियों के चुनने की बात नहीं है —
ये आईपीएल, राष्ट्रीयता, खेल का राजनीति में मिलना, धर्म और खेल का टकराव, और सामाजिक भावना का उभार है।

भारत की जनता आज:

खेल को देखकर गदगद होती है,

राजनीति को देखकर नाराज़ होती है,

और समाज को देखकर चिंतित होती है।

और सबसे बड़ी बात — यह मामला सिर्फ़ क्रिकेट नहीं रहा, यह हमारे विचार, पहचान और एकता का बड़ा मुद्दा बन गया है।

📌 निष्कर्ष

कुल मिलाकर, जो स्टोरी IPL 2026 के लिए टीम बनाने की थी — वो आज देश की सबसे बड़ी बहस बन गयी है।
जहाँ एक तरफ़ खेल और नियम हैं, वहीं दूसरी तरफ़ राजनीति, अहसास, भावना, आस्था और राष्ट्रीय पहचान के सवाल खड़े हो रहे हैं।

और इस सबके बीच, जनता के दिलों में एक ही सवाल गूँज रहा है:

क्या खेल आज राजनीति से अलग रह सकता है, या राजनीति खेल को अपने रंग में रंग देगी?

यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई — यह तो बस शुरू है।


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