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बिहार की शादियों में क्यों गाए जाते हैं ‘गारी गीत’? दूल्हे को गालियां देने की अनोखी परंपरा

बिहार की शादियों में क्यों गाए जाते हैं ‘गारी गीत’? दूल्हे को गालियां देने की अनोखी परंपरा

बिहार की शादियों में क्यों गाए जाते हैं ‘गारी गीत’? दूल्हे और बारातियों को गालियां देने की अनोखी परंपरा

बिहार की पारंपरिक शादियों में ‘गारी गीत’ लोक-संस्कृति का एक दिलचस्प हिस्सा माने जाते हैं। नाम भले ही ‘गारी’ हो, लेकिन इन गीतों का उद्देश्य वास्तव में किसी का अपमान करना नहीं, बल्कि शादी के माहौल में हंसी-मजाक और अपनापन बढ़ाना होता है।

इन गीतों में अक्सर दूल्हे, उसके रिश्तेदारों और बारातियों को लेकर मजाकिया अंदाज में ताने और गालियां गाई जाती हैं। खास बात यह है कि इन्हें आमतौर पर महिलाओं के समूह द्वारा शादी की रस्मों के दौरान गाया जाता है।

आखिर क्यों बनी यह परंपरा?

लोक-संस्कृति के जानकारों के अनुसार, गारी गीतों की परंपरा ग्रामीण और पारंपरिक विवाह समारोहों में सामाजिक मेलजोल का माध्यम रही है। शादी के दौरान दोनों परिवारों के बीच औपचारिकता कम करने और माहौल को हल्का-फुल्का बनाने के लिए ऐसे गीत गाए जाते रहे हैं।

इन गीतों में स्थानीय बोली, हास्य, व्यंग्य और रिश्तों से जुड़े संदर्भ शामिल होते हैं। कई बार दूल्हे के परिवार के सदस्य भी इन्हें हंसी-मजाक के तौर पर लेते हैं और माहौल खुशनुमा बना रहता है।

सिर्फ गाली नहीं, लोक-संस्कृति की झलक

गारी गीतों को केवल गालियों के रूप में देखना इस परंपरा के सांस्कृतिक संदर्भ को अधूरा कर सकता है। इनमें उस क्षेत्र की भाषा, सामाजिक रिश्ते, महिलाओं की सामूहिक भागीदारी और लोक-संगीत की झलक मिलती है।

हालांकि आधुनिक शादियों में डीजे और फिल्मी गानों का चलन बढ़ने के साथ कई जगह ऐसी पारंपरिक रस्में कम होती जा रही हैं। इसके बावजूद बिहार के कई परिवारों में गारी गीत आज भी विवाह समारोह की खास पहचान बने हुए हैं।


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