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छत्तीसगढ़ का अनोखा राउत नाचा: नृत्य नहीं, भगवान कृष्ण की आराधना है यह परंपरा

छत्तीसगढ़ का अनोखा राउत नाचा: नृत्य नहीं, भगवान कृष्ण की आराधना है यह परंपरा

छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति अपनी अनोखी परंपराओं और लोककलाओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। इन्हीं में से एक है राउत नाचा, जिसे सिर्फ एक लोकनृत्य मानना शायद इसकी असली पहचान को कम कर देना होगा। यह नृत्य भगवान श्रीकृष्ण की आराधना और यादव समाज की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है।

राउत नाचा मुख्य रूप से यादव समाज द्वारा किया जाता है। पारंपरिक रूप से इसे दीपावली के आसपास आयोजित किया जाता है। कलाकार पारंपरिक वेशभूषा में सजकर हाथों में लाठी लेकर नृत्य करते हैं और गीत-संगीत के जरिए भगवान कृष्ण तथा उनकी लीलाओं का स्मरण करते हैं।

लोकमान्यता के अनुसार, राउत नाचा की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के वंशज माने जाने वाले यादव समाज से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि इस नृत्य में मनोरंजन के साथ-साथ भक्ति और आस्था का भाव बेहद महत्वपूर्ण होता है।

राउत नाचा के दौरान कलाकारों की लाठियों की ताल, लोकगीत और सामूहिक नृत्य का दृश्य बेहद आकर्षक होता है। कई जगहों पर कलाकार घर-घर जाकर भी पारंपरिक तरीके से नृत्य करते हैं और लोगों को आशीर्वाद देते हैं।

छत्तीसगढ़ की यह परंपरा आज भी नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और लोक विरासत से जोड़ने का काम कर रही है। राउत नाचा इसलिए खास है क्योंकि यहां कदम सिर्फ ताल पर नहीं थिरकते, बल्कि आस्था और परंपरा के रंग में भी रंग जाते हैं।


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