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Indus Waters Treaty: पाकिस्तान पर भारत का पानी वाला दांव, ऐसे बढ़ेगा दबाव

Indus Waters Treaty: पाकिस्तान पर भारत का पानी वाला दांव, ऐसे बढ़ेगा दबाव

Pakistan पर भारत का बड़ा दांव! सिंधु जल संधि के बाद कैसे बढ़ सकता है दबाव, समझें पानी की पूरी रणनीति

नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में पानी अब एक बड़े रणनीतिक मुद्दे के रूप में सामने आ गया है। 1960 में हुई सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) करीब छह दशकों तक दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का आधार रही। लेकिन अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि को निलंबित/abeyance में रखने का फैसला किया। भारत का कहना रहा है कि यह व्यवस्था तब तक लागू नहीं होगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को समाप्त नहीं करता।

अब अगस्त 2026 में भी यह विवाद खत्म नहीं हुआ है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भारत पर दबाव बनाने की अपील की है, जबकि भारत अपने रुख पर कायम है।

1960 की संधि में क्या था?

सिंधु जल संधि विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई थी। इसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और सीमाएं तय की गईं।

संधि में पूर्वी नदियां—रावी, ब्यास और सतलुज—भारत के लिए तथा पश्चिमी नदियां—सिंधु, झेलम और चिनाब—मुख्य रूप से पाकिस्तान के लिए निर्धारित की गईं।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं था कि भारत पश्चिमी नदियों के पानी का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं कर सकता। संधि में भारत को घरेलू उपयोग, कुछ कृषि जरूरतों और निर्धारित शर्तों के तहत जलविद्युत परियोजनाओं के लिए पानी के इस्तेमाल की अनुमति थी।

पहलगाम हमले के बाद भारत ने क्या किया?

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई कड़े कदम उठाए। इनमें सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से निलंबित करना भी शामिल था। भारत ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा पार आतंकवाद से जोड़कर देखा।

तब से दोनों देशों के बीच पानी को लेकर विवाद लगातार बढ़ता गया है।

क्या भारत पाकिस्तान का पानी पूरी तरह रोक सकता है?

तुरंत और पूरी तरह नहीं। यही इस मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

भारत के पास पश्चिमी नदियों पर पाकिस्तान की पूरी जल आपूर्ति रोक देने जितनी विशाल स्टोरेज क्षमता फिलहाल नहीं है। नदियों में आने वाले पानी का बड़ा हिस्सा प्राकृतिक प्रवाह के जरिए पाकिस्तान की ओर जाता है।

लेकिन संधि के निलंबन से भारत के पास अपनी मौजूदा और भविष्य की परियोजनाओं को लेकर ज्यादा रणनीतिक गुंजाइश बनती है। भारत जलाशयों की क्षमता बढ़ाने, जलविद्युत परियोजनाओं को आगे बढ़ाने और पानी के मौसमी प्रवाह को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने पर ज्यादा ध्यान दे सकता है।

यानी असली दबाव एक झटके में पानी बंद करने से ज्यादा लंबे समय की जल-प्रबंधन क्षमता से जुड़ा है।

Baglihar और Salal जैसे प्रोजेक्ट क्यों महत्वपूर्ण हैं?

जम्मू-कश्मीर में Baglihar और Salal जैसे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट चिनाब नदी पर स्थित हैं। संधि के तहत भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ निर्धारित प्रकार की जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति थी।

संधि के निलंबन के बाद इन परियोजनाओं के संचालन और जल प्रबंधन को लेकर भारत की रणनीतिक स्थिति बदली है। 2026 में Baglihar से जुड़े जल प्रवाह और जल प्रबंधन को लेकर भी रिपोर्टें सामने आई हैं।

भारत के लिए चुनौती यह है कि वह इन परियोजनाओं की क्षमता का इस्तेमाल ऊर्जा उत्पादन और जल प्रबंधन दोनों के लिए अधिक प्रभावी तरीके से करे।

पाकिस्तान के लिए पानी इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और कृषि व्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर काफी निर्भर है। सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी नदियां पाकिस्तान की सिंचाई व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

पाकिस्तान पहले से ही पानी की कमी, तेजी से बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों में बदलाव जैसी समस्याओं से जूझ रहा है।

इसी वजह से भारत के साथ सिंधु जल संधि का विवाद पाकिस्तान के लिए सिर्फ कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जल सुरक्षा का विषय भी बन गया है। पाकिस्तान के मंत्री हाल में भारत द्वारा पानी को “weaponise” किए जाने की आशंका भी जता चुके हैं।

पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर क्यों पहुंच रहा है?

भारत के फैसले के खिलाफ पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है। हाल में इशाक डार ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की अपील की और भारत पर जल संबंधी जानकारी साझा नहीं करने का आरोप लगाया।

पाकिस्तान ने पहले भी संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर इस मुद्दे को उठाया है। वहीं भारत का रुख है कि आतंकवाद और सुरक्षा परिस्थितियों को देखते हुए वह संधि को सामान्य तरीके से लागू करने के लिए बाध्य नहीं है।

भारत के लिए सबसे बड़ा फायदा क्या हो सकता है?

संधि के निलंबन के बाद भारत के लिए सबसे बड़ा संभावित लाभ यह है कि वह अपने जल संसाधनों का अधिक व्यापक रणनीतिक और तकनीकी इस्तेमाल करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

Explained: सिंधु जल संधि क्या है... कब हुआ था समझौता, पाकिस्तान के लिए  क्यों जरूरी, जानें सबकुछ
पाकिस्तान पर भारत का बड़ा दांव, पानी से कैसे बढ़ेगा दबाव?

इसमें मुख्य रूप से:

नए और पुराने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को तेजी से आगे बढ़ाना

जलाशयों और स्टोरेज क्षमता का विस्तार

बाढ़ के पानी का बेहतर प्रबंधन

सिंचाई क्षमता बढ़ाना

बिजली उत्पादन बढ़ाना

नदियों के मौसमी प्रवाह का अधिक प्रभावी इस्तेमाल

जैसे कदम शामिल हो सकते हैं।

हालांकि इन परियोजनाओं को बनाने में समय लगता है। इसलिए इसका असर तत्काल नहीं, बल्कि मध्यम और लंबी अवधि में ज्यादा दिखाई दे सकता है।

क्या इससे पाकिस्तान में तुरंत पानी की किल्लत हो जाएगी?

यह दावा करना सही नहीं होगा।

सिंधु बेसिन का जल प्रवाह बहुत बड़ा है और भारत की मौजूदा स्टोरेज क्षमता पाकिस्तान की पूरी जल आवश्यकता को अचानक रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके अलावा पानी का प्रवाह मौसम, बारिश, बर्फ पिघलने और नदी की प्राकृतिक स्थिति पर भी निर्भर करता है।

इसलिए भारत का मौजूदा कदम पाकिस्तान के लिए तत्काल पूर्ण जल नाकेबंदी से ज्यादा एक रणनीतिक और राजनीतिक दबाव का साधन है।

संधि बहाल होगी या विवाद और बढ़ेगा?

फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं है। अप्रैल 2026 में भी विशेषज्ञों ने भारत-पाकिस्तान के बीच संधि बहाल करने की संभावना पर चर्चा की थी, लेकिन दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी बड़ी बाधा बनी हुई है।

भारत का कहना है कि आतंकवाद खत्म होने तक उसका रुख नहीं बदलेगा, जबकि पाकिस्तान संधि को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता बताते हुए इसकी बहाली की मांग कर रहा है।

निष्कर्ष

सिंधु जल संधि का विवाद अब सिर्फ पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं रह गया है। यह भारत-पाकिस्तान के बीच सुरक्षा, कूटनीति, ऊर्जा और जल संसाधनों की रणनीति का हिस्सा बन चुका है।

भारत के लिए सबसे बड़ा संभावित दांव पाकिस्तान का पानी एक झटके में रोकना नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में अपनी स्टोरेज, हाइड्रोपावर और जल प्रबंधन क्षमता को इतना मजबूत करना है कि वह अपने हिस्से के जल संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल कर सके।

वहीं पाकिस्तान के लिए चुनौती यह है कि उसकी कृषि और अर्थव्यवस्था पहले से मौजूद जल संकट के बीच भारत के साथ लंबे समय तक चलने वाले जल विवाद का सामना कैसे करेगी।


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