‘इक्कीस’ के लेखकों का दो टूक जवाब: ‘धुरंधर’ से तुलना बेईमानी, गैंगस्टर फिल्म और युद्ध फिल्म की नैतिकता एक नहीं हो सकती
- byAman Prajapat
- 16 January, 2026
✨ भूमिका: जब तुलना गलत जगह कर दी जाए
हिंदी सिनेमा में तुलना कोई नई बात नहीं है। हर नई फिल्म को किसी पुरानी या चर्चित फिल्म के साथ तौलने की आदत अब परंपरा बन चुकी है। लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग है।
फिल्म ‘इक्कीस’ के लेखकों ने हाल ही में ‘धुरंधर’ से की जा रही तुलना पर खुलकर नाराज़गी जाहिर की है — और उनकी बातों में गुस्सा नहीं, तर्क है।
उनका साफ कहना है:
“एक गैंगस्टर फिल्म का नैतिक ढांचा कभी भी युद्ध पर आधारित फिल्म से मेल नहीं खा सकता।”
और सच कहें तो… बात में दम है।
🎬 ‘इक्कीस’ क्या है और क्यों चर्चा में है?
‘इक्कीस’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक युद्ध की स्मृति, बलिदान की कहानी और सामूहिक नैतिकता का चित्रण है।
यह फिल्म उन परिस्थितियों को दिखाती है जहाँ निर्णय व्यक्तिगत फायदे के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र, टीम और इतिहास के लिए लिए जाते हैं।
इसके लेखक मानते हैं कि यह फिल्म मनोरंजन से ज़्यादा जिम्मेदारी है।
🔫 ‘धुरंधर’ और गैंगस्टर जॉनर की सच्चाई
दूसरी ओर ‘धुरंधर’ एक गैंगस्टर फिल्म है — जहाँ नैतिकता ग्रे ज़ोन में रहती है।
यहाँ नायक अक्सर कानून तोड़ता है, सिस्टम से लड़ता है, और कभी-कभी गलत को भी सही ठहराया जाता है।
गैंगस्टर सिनेमा का मूल स्वभाव ही विद्रोही होता है।
⚖️ लेखकों की आपत्ति: तुलना नहीं, संदर्भ समझिए
‘इक्कीस’ के लेखकों का कहना है कि दोनों फिल्मों को एक ही तराजू में तौलना रचनात्मक अन्याय है।
उनके शब्दों में:
युद्ध फिल्म में नैतिकता सामूहिक होती है
गैंगस्टर फिल्म में नैतिकता व्यक्तिगत
एक में बलिदान महिमामंडित होता है
दूसरी में सत्ता और अस्तित्व की लड़ाई
तो भाई, सेब की तुलना संतरे से क्यों?
🧠 आलोचना बनाम क्लिकबेट संस्कृति
लेखकों ने बिना नाम लिए मीडिया और सोशल मीडिया की क्लिकबेट मानसिकता पर भी निशाना साधा।
आजकल:
तुलना जल्दी होती है
संदर्भ गायब रहता है
और बहस सतही हो जाती है
Gen Z भाषा में कहें तो — “वाइब मैच ही नहीं कर रही, फिर भी भिड़ा दी।”
🎭 सिनेमा सिर्फ फ्रेम नहीं, दर्शन है
‘इक्कीस’ के लेखक मानते हैं कि सिनेमा सिर्फ कैमरा एंगल और डायलॉग नहीं होता, वह एक दर्शन होता है।
युद्ध फिल्में:
इतिहास से बात करती हैं
समाज की सामूहिक चेतना को छूती हैं
जबकि गैंगस्टर फिल्में:
सत्ता के अंधेरे को दिखाती हैं
व्यक्तिगत संघर्ष पर टिकी होती हैं
दोनों ज़रूरी हैं, लेकिन एक जैसे नहीं।

🔥 सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया
जैसे ही यह बयान सामने आया, सोशल मीडिया दो खेमों में बंट गया।
कुछ लोगों ने कहा:
“लेखक सही हैं, तुलना बेकार है”
तो कुछ बोले:
“अरे भाई, ऑडियंस को जो लगे वो बोले”
लेकिन ज्यादातर फिल्मप्रेमियों ने माना कि जॉनर की समझ ज़रूरी है।
🕊️ निष्कर्ष: तुलना नहीं, समझ की ज़रूरत
इस पूरे विवाद का निचोड़ यही है —
हर फिल्म को उसकी आत्मा, संदर्भ और उद्देश्य के साथ देखना चाहिए।
‘इक्कीस’ युद्ध की आग से निकली कहानी है।
‘धुरंधर’ अंडरवर्ल्ड की अंधेरी गलियों की गाथा।
दोनों अपनी जगह सही हैं।
पर उन्हें एक ही आईने में देखना… बस गलत है।
और हाँ —
पुरानी कहावत है:
“हर चीज़ की एक मर्यादा होती है।”
सिनेमा भी उसी पर टिका है। 🎥🔥
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