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Dollar: 2008 के बाद पहली बार बना रिकॉर्ड, डॉलर से निवेशकों ने कमाया मोटा पैसा; अब क्यों बढ़ा खतरा?

Dollar: 2008 के बाद पहली बार बना रिकॉर्ड, डॉलर से निवेशकों ने कमाया मोटा पैसा; अब क्यों बढ़ा खतरा?

Dollar: 2008 के बाद कैरी ट्रेड का शानदार दौर, निवेशकों ने कमाया मोटा पैसा; अब एक झटके में कैसे बढ़ सकता है जोखिम?

नई दिल्ली। ग्लोबल करेंसी मार्केट में डॉलर से जुड़ी निवेश रणनीति एक बार फिर चर्चा में है। इसे Dollar Carry Trade कहा जाता है। इसमें निवेशक अपेक्षाकृत कम ब्याज वाली मुद्रा में उधार लेकर उस रकम को ज्यादा ब्याज देने वाले देशों की करेंसी या बॉन्ड में लगाते हैं। ब्याज दर के अंतर के साथ अगर डॉलर भी कमजोर होता है, तो निवेशकों को अतिरिक्त फायदा मिल सकता है।

हालांकि, यही रणनीति बाजार का रुख बदलने पर तेजी से नुकसान भी करा सकती है।

क्या है Dollar Carry Trade?

आसान भाषा में समझें तो निवेशक कम लागत पर डॉलर उधार लेते हैं और उस पैसे को ऐसे बाजारों में लगाते हैं जहां ब्याज दर ज्यादा होती है।

उदाहरण के लिए, अगर किसी Emerging Market की बॉन्ड यील्ड अमेरिकी बाजार से काफी ज्यादा है और उस देश की करेंसी डॉलर के मुकाबले मजबूत रहती है, तो निवेशक को ब्याज के साथ करेंसी से भी फायदा मिल सकता है।

2026 में Emerging Market debt में विदेशी निवेश मजबूत रहा है। जुलाई तक Emerging Market debt में विदेशी पूंजी का प्रवाह 214 अरब डॉलर से ज्यादा पहुंच गया था, जो दो दशक से अधिक समय में सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है।

डॉलर कमजोर हुआ तो क्यों बढ़ता है फायदा?

Carry trade में करेंसी का उतार-चढ़ाव बेहद महत्वपूर्ण होता है। अगर निवेशक डॉलर में उधार लेकर किसी दूसरी करेंसी में निवेश करता है और बाद में डॉलर कमजोर हो जाता है, तो डॉलर में वापस रकम चुकाने की लागत कम हो सकती है।

यही वजह है कि डॉलर की कमजोरी और Emerging Market currencies की मजबूती इस तरह की रणनीति के लिए अनुकूल माहौल बना सकती है।

हाल के दिनों में अमेरिकी डॉलर पर दबाव देखा गया है। अमेरिकी Treasury के लंबी अवधि के बॉन्ड buybacks बढ़ाने की घोषणा के बाद डॉलर तीन महीने के निचले स्तर तक पहुंचा था।

लेकिन असली खतरा यहीं से शुरू होता है

Carry trade का सबसे बड़ा जोखिम है अचानक करेंसी का रुख बदलना

अगर अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर उम्मीद बदलती है, डॉलर अचानक मजबूत होता है या किसी Emerging Market की करेंसी तेजी से गिरती है, तो निवेशक अपनी पोजीशन बंद करने लग सकते हैं।

ऐसी स्थिति में एक साथ बड़ी मात्रा में पैसा बाहर निकल सकता है। इससे करेंसी, बॉन्ड और दूसरे जोखिम वाले एसेट पर दबाव बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों ने भी चेतावनी दी है कि ऊंचे रिटर्न की तलाश में आने वाली बड़ी मात्रा में विदेशी पूंजी कुछ बाजारों के लिए अस्थिरता का जोखिम पैदा कर सकती है।

भारत पर क्या असर पड़ सकता है?

भारत भी Emerging Market का हिस्सा है, इसलिए ग्लोबल डॉलर और बॉन्ड मार्केट में बड़े बदलाव का असर भारतीय बाजार पर पड़ सकता है।

हाल में रुपये पर भी दबाव देखा गया है। 18 अगस्त को रुपया करीब ₹95.68 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। Reuters के मुताबिक महंगा तेल और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ती लंबी अवधि की बॉन्ड यील्ड रुपये समेत कई Asian currencies के लिए दबाव बढ़ा रही थी।

अगर डॉलर लंबे समय तक कमजोर रहता है तो Emerging Market assets को फायदा मिल सकता है, लेकिन अचानक डॉलर मजबूत होने पर तस्वीर उलट सकती है।

निवेशकों के लिए क्या समझना जरूरी है?

Dollar Carry Trade कोई ऐसा निवेश नहीं है जिसमें सिर्फ ब्याज दर देखकर फायदा तय हो जाता है। इसमें Currency Risk, Interest Rate Risk और Market Risk तीनों महत्वपूर्ण हैं।

यानी ज्यादा ब्याज मिलने के बावजूद अगर संबंधित करेंसी डॉलर के मुकाबले तेजी से गिरती है, तो ब्याज से मिला फायदा भी खत्म हो सकता है।

निष्कर्ष

Dollar Carry Trade ने इस साल ग्लोबल निवेशकों का ध्यान खींचा है और Emerging Market debt में विदेशी पूंजी का मजबूत प्रवाह इसका संकेत है। लेकिन यह रणनीति जितनी आकर्षक दिखती है, उतनी ही जोखिम वाली भी है।

डॉलर की अचानक मजबूती, ब्याज दरों में बदलाव या Emerging Market currencies में तेज गिरावट इस ट्रेड को तेजी से नुकसान में बदल सकती है। इसलिए इसे कम जोखिम वाला निवेश मानना सही नहीं होगा।

Dollar: साल 2008 के बाद पहली बार ऐसा कमाल, डॉलर से हुई मोटी कमाई, लेकिन अब  एक झटके में क्यों डूब सकता है पैसा - CNBC Awaaz

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