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RBI ने बढ़ाया रेपो रेट, 5.50% हुआ ब्याज; होम लोन समेत फ्लोटिंग EMI पर बढ़ सकता है बोझ

RBI ने बढ़ाया रेपो रेट, 5.50% हुआ ब्याज; होम लोन समेत फ्लोटिंग EMI पर बढ़ सकता है बोझ

RBI का बड़ा फैसला, करीब साढ़े तीन साल बाद रेपो रेट में बढ़ोतरी

मुंबई/नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक ने बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के बाद रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट यानी 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। इसके साथ ही RBI का पॉलिसी रेपो रेट 5.25% से बढ़कर 5.50% हो गया है। यह बढ़ोतरी करीब साढ़े तीन साल के अंतराल के बाद हुई है।

RBI के इस फैसले का सीधा असर बैंकिंग और लोन बाजार पर देखने को मिल सकता है। खासतौर पर ऐसे ग्राहक जिनका होम लोन या अन्य फ्लोटिंग रेट वाला कर्ज बाहरी बेंचमार्क से जुड़ा है, उनके लिए ब्याज दर बढ़ने की संभावना है। हालांकि हर ग्राहक की EMI तुरंत और समान मात्रा में नहीं बढ़ेगी, क्योंकि इसका असर बैंक के रीसेट नियम और लोन की ब्याज दर से जुड़ाव पर निर्भर करेगा।

रेपो रेट 5.25% से बढ़कर 5.50%

RBI की छह सदस्यीय MPC ने रेपो रेट बढ़ाने का फैसला सर्वसम्मति से लिया। इसके साथ ही SDF यानी Standing Deposit Facility की दर 5.25% और MSF तथा Bank Rate 5.75% हो गए हैं। RBI ने इस बार अपनी मौद्रिक नीति का रुख भी ‘Neutral’ से बदलकर ‘Calibrated Tightening’ कर दिया है।

यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि RBI का फोकस अब महंगाई के जोखिमों को देखते हुए ब्याज दरों को नियंत्रित रखने पर ज्यादा है। हालांकि आगे और कितनी बढ़ोतरी होगी, यह महंगाई, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

EMI पर कितना असर पड़ सकता है?

रेपो रेट बढ़ने के बाद सबसे बड़ा सवाल उन लोगों के सामने है जिनकी EMI चल रही है। खासकर फ्लोटिंग रेट वाले होम लोन ग्राहकों पर इसका असर पड़ सकता है।

External Benchmark Linked Rate यानी बाहरी बेंचमार्क से जुड़े लोन में ब्याज दरों का बदलाव अपेक्षाकृत जल्दी दिखाई दे सकता है। वहीं पुराने MCLR से जुड़े लोन में इसका असर अपेक्षाकृत धीमी गति से दिखाई दे सकता है। Fixed-rate loan लेने वाले ग्राहकों की ब्याज दर सामान्यतः इस रेपो रेट बदलाव से सीधे प्रभावित नहीं होती।

उदाहरण के तौर पर, कुछ गणनाओं में 20 साल की अवधि वाले ₹50 लाख के होम लोन पर 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी से EMI में लगभग ₹780 तक का अंतर बताया गया है। वास्तविक असर ग्राहक की मौजूदा ब्याज दर, बाकी लोन अवधि और बैंक के रीसेट नियम पर निर्भर करेगा।

हर ग्राहक की EMI तुरंत नहीं बढ़ेगी

यह समझना जरूरी है कि RBI की ओर से रेपो रेट बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि अगले ही दिन हर बैंक ग्राहक की EMI एक निश्चित राशि से बढ़ जाएगी।

बैंक किस तरह और कब ब्याज दर में बदलाव करेगा, यह लोन के प्रकार और संबंधित बैंक के नियमों पर निर्भर करता है। External Benchmark से जुड़े लोन में बदलाव तेजी से आ सकता है, जबकि MCLR जैसे पुराने सिस्टम से जुड़े लोन में ट्रांसमिशन में ज्यादा समय लग सकता है।

कुछ मामलों में बैंक EMI बढ़ाने के बजाय लोन की अवधि बढ़ा सकते हैं, जिससे मासिक भुगतान लगभग समान रह सकता है लेकिन ग्राहक को लंबे समय तक ब्याज चुकाना पड़ सकता है।

RBI ने क्यों बढ़ाया रेपो रेट?

RBI के फैसले के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारणों में महंगाई का बढ़ता दबाव शामिल है। अगस्त 2026 में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82% हो गई, जो जुलाई के 4.45% के मुकाबले ज्यादा है। RBI ने चालू वित्त वर्ष के लिए अपनी महंगाई का अनुमान भी बढ़ाकर 5.2% कर दिया है।

वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक परिस्थितियों से भी महंगाई को लेकर जोखिम बढ़ा है। RBI ने इन परिस्थितियों के बीच ब्याज दर बढ़ाकर महंगाई के दबाव को नियंत्रित करने की दिशा में कदम उठाया है।

अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी मजबूत

महंगाई के दबाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मजबूत बनी हुई है। RBI ने चालू वित्त वर्ष के लिए वास्तविक GDP वृद्धि का अनुमान 7.1% रखा है। अप्रैल-जून तिमाही में GDP वृद्धि 7.8% रही थी।

यानी RBI के सामने एक तरफ महंगाई को नियंत्रित रखने की चुनौती है, जबकि दूसरी तरफ आर्थिक वृद्धि को बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी इसी संतुलन को ध्यान में रखकर की गई नीति का हिस्सा है।

बैंकिंग सेक्टर में क्या असर होगा?

रेपो रेट बढ़ने से बैंकों के लिए RBI से मिलने वाली अल्पकालिक फंडिंग की लागत बढ़ सकती है। इसका असर बैंकिंग सिस्टम में लोन की कीमतों पर पड़ सकता है।

होम लोन, कार लोन, बिजनेस लोन और कुछ अन्य फ्लोटिंग-रेट कर्ज महंगे हो सकते हैं। वहीं दूसरी ओर जमा दरों और FD पर ब्याज को लेकर भी बाजार में बदलाव की संभावना रहती है, हालांकि इसका असर हर बैंक में अलग-अलग हो सकता है।

बैंकिंग सेक्टर के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि ब्याज दर बढ़ने के बावजूद कर्ज की मांग कितनी मजबूत रहती है। RBI के अनुसार बैंक क्रेडिट ग्रोथ हाल के महीनों में मजबूत रही है।

आगे और बढ़ सकती हैं ब्याज दरें?

RBI ने अपने नीति रुख को ‘Calibrated Tightening’ में बदल दिया है। इससे बाजार में आगे की ब्याज दरों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि RBI ने यह स्पष्ट संकेत नहीं दिया कि अगली बैठक में निश्चित रूप से कितनी बढ़ोतरी होगी।

अर्थशास्त्रियों के अनुमान अलग-अलग हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि महंगाई और वैश्विक तेल कीमतों का दबाव बना रहता है तो आगे और बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं अंतिम फैसला आने वाले आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर करेगा।

आम लोगों के लिए क्या मतलब?

RBI का यह फैसला सीधे तौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके ऊपर फ्लोटिंग ब्याज दर वाला कर्ज है। नई होम लोन या अन्य बड़ी उधारी लेने वाले ग्राहकों को भी अब ब्याज दरों को ध्यान में रखकर अपनी मासिक वित्तीय योजना बनानी पड़ सकती है।

दूसरी तरफ बैंक जमा और FD की दरों में संभावित बदलाव से बचत करने वालों को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन इसका वास्तविक लाभ बैंक और उत्पाद के हिसाब से अलग-अलग होगा।

कुल मिलाकर, 25 बेसिस पॉइंट की यह बढ़ोतरी छोटी दिखाई दे सकती है, लेकिन इसका संकेत बड़ा है। करीब चार साल के अंतराल के बाद RBI ने दर बढ़ाई है और नीति रुख को भी ‘Calibrated Tightening’ किया है। अब बाजार की नजर अगले कुछ महीनों की महंगाई, कच्चे तेल की कीमतों, रुपये की स्थिति और आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों पर रहेगी।


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