ईरान संकट के बीच भारत अलर्ट, तेल-गैस सप्लाई सुरक्षित करने के लिए अमेरिका से तेज़ हुई बातचीत
- bypari rathore
- 05 March, 2026
ईरान संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर फोकस, तेल-गैस सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए तेज़ हुई कूटनीतिक पहल
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर तैयारियां तेज कर दी हैं। खाड़ी क्षेत्र में जारी अनिश्चितता को देखते हुए केंद्र सरकार तेल और गैस की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कई स्तरों पर प्रयास कर रही है। इसी क्रम में प्रमुख ऊर्जा साझेदार देशों के साथ बातचीत तेज की गई है, जिसमें अमेरिका के साथ हुई हालिया चर्चा भी शामिल है।
दरअसल, वैश्विक ऊर्जा बाजार की निगाहें इन दिनों खास तौर पर Strait of Hormuz पर टिकी हुई हैं। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा ट्रांजिट रूट्स में से एक माना जाता है। अनुमान के मुताबिक दुनिया के कुल तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी जलमार्ग से होकर गुजरता है। ऐसे में अगर इस क्षेत्र में सैन्य या राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो इसका असर सीधे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है।
खाड़ी क्षेत्र में मौजूदा हालात को देखते हुए India सरकार ने ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े संभावित जोखिमों का आकलन शुरू कर दिया है। सरकार की कोशिश है कि किसी भी परिस्थिति में देश में तेल और गैस की उपलब्धता प्रभावित न हो। इसके लिए ऊर्जा आयात के स्रोतों को विविध बनाने, वैकल्पिक सप्लाई लाइनों पर विचार करने और ऊर्जा कंपनियों के साथ समन्वय बढ़ाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक इसी रणनीति के तहत United States के साथ ऊर्जा सहयोग को लेकर बातचीत की गई है। इस चर्चा में वैश्विक ऊर्जा बाजार की मौजूदा स्थिति, संभावित आपूर्ति जोखिम और ऊर्जा साझेदारी को मजबूत करने जैसे मुद्दों पर विचार हुआ। अमेरिका पिछले कुछ वर्षों में भारत के लिए कच्चे तेल और एलएनजी का एक महत्वपूर्ण सप्लायर बनकर उभरा है, ऐसे में दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या समुद्री मार्गों में किसी तरह की बाधा आती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जा सकती है। इसका असर उन देशों पर ज्यादा पड़ता है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं। भारत भी अपनी कुल तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए वैश्विक बाजार में किसी भी अस्थिरता का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
हालांकि भारत पिछले कुछ वर्षों से ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति पर काम कर रहा है। सरकार ने मध्य पूर्व के पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं के अलावा अमेरिका, रूस और अन्य देशों से भी तेल और गैस आयात बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। इसके अलावा देश में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) को मजबूत करने पर भी जोर दिया जा रहा है ताकि आपात स्थिति में कुछ समय तक घरेलू मांग को पूरा किया जा सके।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े जोखिमों को देखते हुए भारत को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में और तेजी से काम करने की जरूरत है। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाना, घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करना और ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देना शामिल है।
सरकार का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों पर लगातार नजर रखी जा रही है और जरूरत पड़ने पर तत्काल कदम उठाए जाएंगे। सरकार का प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वैश्विक अस्थिरता के बावजूद देश में ईंधन की आपूर्ति सामान्य बनी रहे और आम उपभोक्ताओं पर इसका अनावश्यक बोझ न पड़े।
पश्चिम एशिया की बदलती स्थिति के बीच भारत की सक्रिय कूटनीति और ऊर्जा रणनीति यह संकेत देती है कि सरकार संभावित चुनौतियों से निपटने के लिए पहले से तैयारी कर रही है।

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