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सुपरटैंकरों की भारी कमी से बढ़ा कच्चे तेल का संकट, दुनिया भर में महंगा पड़ सकता है Oil Transport

सुपरटैंकरों की भारी कमी से बढ़ा कच्चे तेल का संकट, दुनिया भर में महंगा पड़ सकता है Oil Transport

Crude Oil Tanker Crisis: सुपरटैंकरों की भारी कमी, अब पूरी दुनिया में आने वाला है कच्चे तेल का सबसे बड़ा संकट?

दुनिया के कच्चे तेल बाजार पर एक नया संकट गहराता दिखाई दे रहा है। इस बार चिंता सिर्फ तेल की सप्लाई को लेकर नहीं है, बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक कच्चा तेल पहुंचाने वाले सुपरटैंकरों यानी Very Large Crude Carriers (VLCCs) की उपलब्धता को लेकर भी है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, कुछ प्रमुख बाजारों में किराए के लिए उपलब्ध बड़े तेल टैंकर बेहद कम रह गए हैं और इसी वजह से समुद्र के रास्ते कच्चे तेल की ढुलाई का खर्च रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है।

सुपरटैंकरों की कमी क्यों बनी बड़ी समस्या?

कच्चे तेल की वैश्विक सप्लाई एक जटिल समुद्री परिवहन नेटवर्क पर निर्भर करती है। जब युद्ध, हमले या प्रमुख समुद्री मार्गों में व्यवधान आता है तो जहाजों को लंबे रास्तों से जाना पड़ता है। इससे एक टैंकर को एक यात्रा पूरी करने में ज्यादा समय लगता है और उपलब्ध जहाजों की संख्या प्रभावी रूप से कम हो जाती है।

मौजूदा पश्चिम एशिया संकट में Strait of Hormuz से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आई है। Reuters के मुताबिक 20 सितंबर के सप्ताहांत में सिर्फ 17 कमोडिटी जहाजों ने होर्मुज पार किया, जबकि पिछले सप्ताह यह संख्या 37 थी और संकट से पहले औसतन करीब 125 जहाज प्रतिदिन इस रास्ते से गुजरते थे।

VLCC का किराया पहुंचा रिकॉर्ड स्तर पर

इस संकट का सबसे बड़ा असर तेल टैंकरों की कीमत पर दिखाई दे रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक Persian Gulf से Asia के लिए VLCC किराया कुछ महीनों में करीब 12 गुना बढ़कर लगभग 11 लाख डॉलर प्रतिदिन तक पहुंच गया है। इसका मतलब है कि केवल तेल को समुद्र के रास्ते ले जाने की लागत ही प्रति बैरल कई डॉलर बढ़ रही है।

Bloomberg की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ लंबी दूरी के तेल कारोबार अब इतने महंगे हो गए हैं कि उनका आर्थिक फायदा कम होता जा रहा है। इसका असर यह हो सकता है कि रिफाइनर दूर के बाजारों से तेल खरीदने के बजाय अपने नजदीक उपलब्ध स्रोतों की तरफ ज्यादा रुख करें।

तेल की कीमत पर क्या होगा असर?

टैंकरों की कमी का सीधा असर तेल की अंतिम कीमत पर पड़ सकता है। अगर किसी देश को कच्चा तेल खरीदने के बाद उसे हजारों किलोमीटर दूर समुद्र के रास्ते लाना है और जहाज का किराया अचानक कई गुना बढ़ जाता है, तो आयात की कुल लागत भी बढ़ती है।

इसका असर आगे चलकर पेट्रोल, डीजल, एविएशन फ्यूल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर देश में कीमतें एक ही अनुपात में बढ़ेंगी। कीमतों पर स्थानीय टैक्स, सरकारी नीतियां, मुद्रा विनिमय दर, रिफाइनरी क्षमता और घरेलू सप्लाई जैसे कई अन्य कारक भी असर डालते हैं।

सऊदी अरब के लिए भी बढ़ी चुनौती

सऊदी अरब की East-West Pipeline में व्यवधान ने संकट को और जटिल बनाया है। यह पाइपलाइन फारस की खाड़ी से निकलने वाले तेल को Red Sea तक पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण वैकल्पिक मार्ग रही है। इसके प्रभावित होने से ज्यादा तेल को समुद्री रास्तों, खासकर Gulf क्षेत्र से बाहर निकालने की जरूरत बढ़ी है।

Reuters के मुताबिक सऊदी अरब ने हाल के दिनों में Gulf terminals से अपने crude exports बढ़ाए और 20 सितंबर को सात VLCCs पर करीब 14 मिलियन बैरल crude लोड किया गया।

जहाजों की कमी से बढ़ रही है दूरी और लागत

समस्या यह है कि जब सामान्य समुद्री मार्ग बाधित होते हैं तो जहाजों को वैकल्पिक और लंबे रास्तों से भेजना पड़ता है। एक जहाज जितना ज्यादा समय यात्रा में लगाएगा, उतने ही कम जहाज एक निश्चित अवधि में दूसरी यात्रा के लिए उपलब्ध रहेंगे।

यही वजह है कि मौजूदा संकट में सिर्फ तेल की सप्लाई ही महत्वपूर्ण नहीं रह गई है, बल्कि shipping capacity खुद एक रणनीतिक संसाधन बन गई है।

कुछ रिपोर्टों के अनुसार, Houston से Asia तक crude पहुंचाने की लागत करीब 26 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी है। एक बड़े cargo के लिए यह अतिरिक्त परिवहन लागत करीब 52 मिलियन डॉलर तक बैठ सकती है।

दुनिया में नए सुपरटैंकरों के ऑर्डर भी बढ़े

संकट का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिपिंग कंपनियां भविष्य के लिए नए VLCC ऑर्डर कर रही हैं। Reuters के मुताबिक 2026 में अब तक 217 से अधिक VLCCs के ऑर्डर दिए जा चुके हैं, जो पिछले साल की संख्या से लगभग दोगुने हैं। इन ऑर्डरों का कुल मूल्य 20 अरब डॉलर से अधिक बताया गया है।

लेकिन नए जहाज तुरंत बाजार में नहीं आ सकते। एक नए सुपरटैंकर के निर्माण और डिलीवरी में लंबा समय लग सकता है। इसलिए अगर मौजूदा संकट लंबे समय तक जारी रहता है, तो अगले कुछ समय तक पुराने जहाजों पर ही अतिरिक्त दबाव बना रह सकता है।

क्या पूरी दुनिया में कच्चे तेल का संकट आने वाला है?

मौजूदा परिस्थितियां निश्चित रूप से वैश्विक तेल बाजार पर दबाव बढ़ा रही हैं, लेकिन इसे सीधे तौर पर दुनिया भर में सबसे बड़े तेल संकट की शुरुआत कहना अभी जल्दबाजी होगी। तेल का बाजार कई वैकल्पिक स्रोतों, भंडार और समुद्री मार्गों पर निर्भर करता है।

फिर भी खतरा गंभीर है क्योंकि एक साथ कई कड़ियां प्रभावित हो रही हैं—तेल उत्पादन, पाइपलाइन, समुद्री मार्ग और टैंकर उपलब्धता।

IEA ने अगस्त में अनुमान लगाया था कि 2026 में वैश्विक तेल आपूर्ति करीब 4.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन, यानी लगभग 4% घट सकती है।

अगर समुद्री परिवहन की बाधाएं लंबे समय तक बनी रहती हैं और प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्रों से निर्यात प्रभावित होता है, तो दुनिया के कई देशों में ऊर्जा लागत बढ़ने का दबाव और मजबूत हो सकता है।

भारत पर भी पड़ सकता है असर

भारत दुनिया के बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय crude prices और समुद्री freight costs में बड़ा बदलाव भारतीय ऊर्जा बाजार को भी प्रभावित कर सकता है।

अगर तेल आयात की लागत लगातार बढ़ती है तो इसका असर रिफाइनिंग लागत, पेट्रोलियम उत्पादों, परिवहन और अंततः कई वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि भारत पर वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें कितने समय तक ऊंची रहती हैं, भारत किन स्रोतों से कितना तेल खरीदता है और shipping disruptions कितने लंबे समय तक जारी रहते हैं।

निष्कर्ष

दुनिया के सामने इस समय एक ऐसी स्थिति बन रही है जहां तेल उपलब्ध होने के बावजूद उसे सही समय पर सही जगह पहुंचाना महंगा और मुश्किल होता जा रहा है। सुपरटैंकरों की कमी, समुद्री मार्गों में व्यवधान और बढ़ती freight rates ने वैश्विक तेल सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा दिया है।

अगर पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो आने वाले दिनों में बाजार के लिए सबसे बड़ा सवाल सिर्फ “तेल कितना है?” नहीं रहेगा, बल्कि यह भी होगा कि “तेल को दुनिया के बाजारों तक पहुंचाने के लिए कितने जहाज उपलब्ध हैं?”


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