अंतरिक्ष में AI Data Centre का नया प्रयोग, Google ने ऑर्बिट में भेजे AI चिप्स; अब अंतरिक्ष में चलेगा AI का टेस्ट
- bySanjay
- 02 October, 2026
अंतरिक्ष में AI Data Centre का नया प्रयोग, Google ने ऑर्बिट में भेजे AI चिप्स; अब अंतरिक्ष में चलेगा AI का टेस्ट
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती मांग के बीच अब दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां डेटा सेंटर की सीमाओं को धरती से बाहर ले जाने की दिशा में प्रयोग कर रही हैं। इसी कड़ी में Google ने Project Suncatcher के तहत एक प्रोटोटाइप सैटेलाइट को अंतरिक्ष की कक्षा में भेजा है। इस सैटेलाइट में Google के खास AI प्रोसेसर यानी Tensor Processing Units (TPUs) लगाए गए हैं। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या भविष्य में बड़े पैमाने पर AI कंप्यूटिंग के लिए अंतरिक्ष में सोलर-पावर्ड डेटा सेंटर बनाए जा सकते हैं।
यह प्रयोग ऐसे समय में हो रहा है जब AI मॉडल को ट्रेन और रन करने के लिए दुनिया भर में बड़े डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं। इन डेटा सेंटरों को भारी मात्रा में बिजली, जमीन और कूलिंग की जरूरत होती है। Google का विचार है कि अगर कंप्यूटिंग हार्डवेयर को पृथ्वी की कक्षा में रखा जाए तो वहां सौर ऊर्जा का लगातार अधिक उपयोग किया जा सकता है और भविष्य में AI इंफ्रास्ट्रक्चर की कुछ मौजूदा सीमाओं को कम किया जा सकता है। हालांकि, यह अभी शुरुआती प्रयोग है और अंतरिक्ष में बड़े व्यावसायिक डेटा सेंटर स्थापित होने में कई तकनीकी और आर्थिक चुनौतियां बाकी हैं।
Google का Project Suncatcher क्या है?

Project Suncatcher Google का एक रिसर्च प्रोजेक्ट है, जिसका लक्ष्य यह जांचना है कि क्या मशीन लर्निंग और AI के लिए जरूरी कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को अंतरिक्ष में स्थापित किया जा सकता है।
इसके लिए Google ने Planet Labs के साथ मिलकर एक प्रोटोटाइप सैटेलाइट तैयार किया। करीब फ्रिज के आकार के इस प्रोटोटाइप में चार TPU AI चिप्स लगाए गए हैं। इन चिप्स को पृथ्वी पर Google के डेटा सेंटरों में AI मॉडल चलाने और ट्रेनिंग से जुड़े कामों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
1 अक्टूबर 2026 को यह प्रोटोटाइप SpaceX के Falcon 9 रॉकेट से Transporter-18 मिशन के जरिए कक्षा में पहुंचा। अब वास्तविक अंतरिक्ष वातावरण में इन चिप्स के प्रदर्शन और विश्वसनीयता की जांच की जा रही है।
अंतरिक्ष में AI चलाने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है?
AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। चैटबॉट, जनरेटिव AI, वीडियो और इमेज मॉडल, वैज्ञानिक कंप्यूटिंग तथा स्वचालित प्रणालियों के लिए लगातार ज्यादा कंप्यूटिंग क्षमता की जरूरत पड़ रही है।
पृथ्वी पर बड़े AI डेटा सेंटर बनाने के लिए तीन बड़ी चीजों की जरूरत होती है—
- बड़ी मात्रा में बिजली
- पर्याप्त जमीन और इंफ्रास्ट्रक्चर
- कंप्यूटिंग चिप्स से पैदा होने वाली गर्मी को निकालने की व्यवस्था
अंतरिक्ष में डेटा सेंटर का विचार इसी समस्या को अलग तरीके से हल करने की कोशिश है। विशेष रूप से ऐसी कक्षाओं में जहां सैटेलाइट को लंबे समय तक सूर्य की रोशनी मिल सकती है, सोलर पैनल से ऊर्जा प्राप्त करने की संभावना काफी अधिक हो सकती है। Google के अनुसार कुछ उपयुक्त कक्षीय स्थितियों में सोलर पैनल पृथ्वी की सतह की तुलना में कई गुना अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं।
लेकिन अंतरिक्ष में डेटा सेंटर बनाना इतना आसान नहीं
अंतरिक्ष में AI डेटा सेंटर का विचार आकर्षक जरूर है, लेकिन इसके सामने बड़ी तकनीकी चुनौतियां हैं।
सबसे पहली चुनौती है रेडिएशन। अंतरिक्ष में मौजूद विकिरण इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और कंप्यूटिंग चिप्स को प्रभावित कर सकता है। इसलिए यह देखना जरूरी है कि AI प्रोसेसर लंबे समय तक वहां सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से काम कर पाते हैं या नहीं।
दूसरी बड़ी चुनौती है तापमान और कूलिंग।
धरती पर कंप्यूटर और डेटा सेंटरों को ठंडा करने के लिए हवा और अन्य कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन अंतरिक्ष के निर्वात में सामान्य एयर-कूलिंग काम नहीं करती। इसलिए अंतरिक्ष में कंप्यूटिंग चिप्स से निकलने वाली गर्मी को विशेष हीट पाइप और रेडिएटर के जरिए बाहर निकालना पड़ता है।
सिर्फ 15 मिनट तक AI चलाने का प्रयोग
Project Suncatcher के शुरुआती परीक्षण में AI कंप्यूटिंग को लगातार लंबे समय तक चलाने के बजाय सीमित अवधि में संचालित किया जा रहा है।
रिपोर्टों के मुताबिक प्रोटोटाइप सैटेलाइट के TPUs लगभग 15 मिनट के अंतराल में AI काम करेंगे, जिसके बाद सिस्टम को गर्मी नियंत्रित करने के लिए ब्रेक देना होगा। इस दौरान Google का AI मॉडल चलाकर यह देखा जाएगा कि अंतरिक्ष में मौजूद कंप्यूटिंग हार्डवेयर वास्तविक परिस्थितियों में कैसा प्रदर्शन करता है।
यह परीक्षण खास तौर पर यह समझने में मदद करेगा कि अंतरिक्ष में AI प्रोसेसर को कितनी गर्मी पैदा होती है, उसे कितनी तेजी से बाहर निकाला जा सकता है और विकिरण का चिप्स की विश्वसनीयता पर क्या प्रभाव पड़ता है।
Gemini और AI मॉडल की भी होगी जांच
इस प्रयोग का उद्देश्य केवल चिप्स को अंतरिक्ष में चालू करना नहीं है। Google यह भी देख रहा है कि AI मॉडल वास्तविक कक्षीय वातावरण में कंप्यूटिंग हार्डवेयर पर कैसे काम करते हैं।
रिपोर्टों के अनुसार मिशन में Google के AI मॉडल चलाए जाएंगे और सीमित AI क्वेरी को प्रोसेस किया जाएगा। इससे कंपनी को भविष्य के बड़े orbital computing सिस्टम के लिए जरूरी तकनीकी जानकारी मिल सकती है।
भविष्य में बन सकता है AI Satellites का नेटवर्क
Google का मौजूदा मिशन केवल एक सैटेलाइट तक सीमित नहीं है। कंपनी भविष्य में कई सैटेलाइट को आपस में जोड़कर एक नेटवर्क बनाने की दिशा में भी काम कर रही है।
2027 में आगे के परीक्षणों में हाई-बैंडविड्थ लेजर कम्युनिकेशन जैसी तकनीकों को जांचने की योजना बताई गई है। इसका उद्देश्य अलग-अलग ऑर्बिटल कंप्यूटिंग सैटेलाइटों को आपस में जोड़ना है ताकि वे एक बड़े कंप्यूटिंग सिस्टम की तरह काम कर सकें।
अगर ऐसी तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है तो भविष्य में अंतरिक्ष में मौजूद कई सैटेलाइट मिलकर AI कंप्यूटिंग का नेटवर्क बना सकते हैं।
भारत भी ऑर्बिटल AI कंप्यूटिंग की दौड़ में
इस क्षेत्र में सिर्फ Google ही प्रयोग नहीं कर रहा है। भारतीय स्पेस स्टार्टअप TakeMe2Space ने भी MOI-1A के जरिए ऑर्बिटल कंप्यूटिंग पर काम किया है।
कंपनी के अनुसार MOI-1A को अंतरिक्ष में ही पृथ्वी से मिलने वाले डेटा को प्रोसेस करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसका मतलब यह है कि सैटेलाइट को हर बार पूरा कच्चा डेटा धरती पर भेजने की जरूरत कम हो सकती है। AI मॉडल सैटेलाइट पर ही डेटा का विश्लेषण करके जरूरी जानकारी को आगे भेज सकते हैं।
यह तरीका खास तौर पर पृथ्वी की तस्वीरों और रिमोट-सेंसिंग डेटा के मामले में उपयोगी हो सकता है, क्योंकि बड़ी मात्रा में डेटा को लगातार धरती पर भेजने में समय और संचार क्षमता दोनों लगते हैं।
AI डेटा सेंटर की बजाय 'ऑर्बिटल कंप्यूटिंग' क्यों महत्वपूर्ण?
अंतरिक्ष में कंप्यूटिंग का मतलब सिर्फ धरती के किसी बड़े डेटा सेंटर को उठाकर अंतरिक्ष में रख देना नहीं है।
एक महत्वपूर्ण विचार है ऑर्बिटल एज कंप्यूटिंग। इसमें सैटेलाइट पर ही डेटा को शुरुआती स्तर पर प्रोसेस किया जाता है और सिर्फ जरूरी परिणाम धरती पर भेजे जाते हैं।
उदाहरण के लिए किसी सैटेलाइट ने किसी बड़े इलाके की हजारों तस्वीरें लीं। पारंपरिक व्यवस्था में इन तस्वीरों का बड़ा हिस्सा धरती पर भेजना पड़ सकता है। लेकिन अगर सैटेलाइट पर AI मौजूद है तो वह तस्वीरों का विश्लेषण करके केवल जरूरी जानकारी भेज सकता है।
इससे संचार पर दबाव और डेटा ट्रांसमिशन की जरूरत कम हो सकती है। भारतीय कंपनी TakeMe2Space भी अपने ऑर्बिटल कंप्यूटिंग मॉडल में इसी तरह के उपयोग पर जोर दे रही है।
क्या भविष्य में पूरा AI Data Centre अंतरिक्ष में होगा?
फिलहाल इसका जवाब निश्चित रूप से हां नहीं है।
अंतरिक्ष में AI डेटा सेंटर की तकनीक अभी प्रयोग और शुरुआती प्रदर्शन के चरण में है। लॉन्च की लागत, हार्डवेयर की विश्वसनीयता, रेडिएशन, कूलिंग, संचार, मरम्मत और सैटेलाइटों के रखरखाव जैसी कई समस्याओं का समाधान करना बाकी है।
एक हालिया अकादमिक अध्ययन ने भी संकेत दिया है कि कम-पृथ्वी कक्षा में कुछ AI inference workloads संभव हो सकते हैं, लेकिन बहुत बड़े frontier AI मॉडल की training को अंतरिक्ष में करना अभी पृथ्वी के डेटा सेंटरों की तुलना में आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी नहीं दिखता।
इसलिए Project Suncatcher को फिलहाल एक तकनीकी प्रयोग के तौर पर देखना ज्यादा सही है, न कि अंतरिक्ष में तैयार हो चुका व्यावसायिक AI डेटा सेंटर।
अगर प्रयोग सफल हुआ तो क्या बदल सकता है?
अगर Google और दूसरी कंपनियां इस तकनीक की बड़ी चुनौतियों को हल करने में सफल होती हैं तो आने वाले वर्षों में AI इंफ्रास्ट्रक्चर का एक नया मॉडल सामने आ सकता है।
संभावित बदलावों में—
- सौर ऊर्जा से चलने वाले ऑर्बिटल कंप्यूटिंग सिस्टम
- सैटेलाइट पर सीधे AI डेटा प्रोसेसिंग
- पृथ्वी पर भेजे जाने वाले कच्चे डेटा की मात्रा में कमी
- आपस में जुड़े AI सैटेलाइट नेटवर्क
- पृथ्वी के रिमोट-सेंसिंग डेटा का तेज विश्लेषण
- अंतरिक्ष आधारित क्लाउड और एज-कंप्यूटिंग सेवाएं
जैसी तकनीकों का विकास शामिल हो सकता है।
हालांकि इन संभावनाओं को वास्तविक बड़े पैमाने की सेवा में बदलने के लिए अभी लंबे समय तक परीक्षण और लागत में कमी जरूरी होगी।
AI और Space Technology का नया संगम
Google का Project Suncatcher इस बात का संकेत है कि AI की अगली बड़ी दौड़ सिर्फ ज्यादा शक्तिशाली चिप्स बनाने तक सीमित नहीं रह सकती। कंपनियां अब यह भी तलाश रही हैं कि AI कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को कहां स्थापित किया जाए।
धरती पर बिजली, जमीन और कूलिंग की बढ़ती जरूरत के बीच अंतरिक्ष में उपलब्ध सौर ऊर्जा और ऑर्बिटल वातावरण एक संभावित विकल्प के रूप में सामने आया है। लेकिन फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या यह तकनीक लंबे समय में तकनीकी रूप से भरोसेमंद और आर्थिक रूप से व्यवहारिक बन पाएगी।
Project Suncatcher का मौजूदा मिशन इसी सवाल का शुरुआती जवाब खोजने की कोशिश है।
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